ज़िंदगी को समझने में देरी हुई, चोट खाकर संभलने में देरी हुई....

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  • Jeevan Mantra

ज़िंदगी को 

समझने में देरी हुई,

चोट खाकर 

संभलने में देरी हुई....

 

हाथ पर हाथ धरकर 

मैं बैठा रहा,

उनके दिल में 

उतरने में देरी हुई....

 

ढल चुकी रात 

होने को आयी सहर,

उनसे वो बात 

कहने में देरी हुई....

 

कारवाँ जा चुका होगा 

जाने कहाँ ?

मुझको कपड़े 

बदलने में देरी हुई....

 

बेख़बर वो रहा 

पेड़ कटता रहा,

उस परिंदे को 

उड़ने में देरी हुई....

 

ज़िंदगी सबको देती है 

मौक़ा मगर,

सो रहा था मैं 

जगने में देरी हुई....

 

विवेक कुमार जैन, आगरा।

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