तृतीय गृहाधीश श्रीव्रजेशकुमारजी महाराज कृत' श्रीचक्रवर्ती स्तवनम्' - 4

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।।श्रीद्वारकेशो जयति।।

तृतीय गृह गौरवगान

प्रसंग:- 339

तृतीय गृहाधीश श्रीव्रजेशकुमारजी महाराज कृत' श्रीचक्रवर्ती स्तवनम्' - 4

श्रीव्रजेशकुमारजी महाराज की इस रससभर रचना के सात श्लोकों का रसपान अब तक हमने किया। आज अंतिम तीन श्लोकों का भावदर्शन करते हैं।

"श्रीराधिका-हृदयचन्द्र-चकोर लीलः

कुञ्जान्तरे निभृत-केलिविलासशीलः।

भूयान् मदीय हृदयाम्बुजमध्यवर्ती

श्रीद्वारकानगर-नागर-चक्रवर्ती।।8।।"

श्रीराधिकाजी के हृदयरूपी चन्द्र के संयोग की प्राप्ति हेतु चकोर के समान लीला करनेवाले, व्रज की एकान्त निकुंजों में गूढ़-रसमय विहारकेलि में कुशल हे श्रीद्वारकेश प्रभु! श्रीद्वारका नगर के नागरिकों के चक्रवर्ती ऐसे आप मेरे हृदयकमल के मध्य विराजमान हों।

"राजाधिराज रसिकेन्द्रशिरोमणि स्त्वं

गोष्ठाधिपस्य मथुराधिपतेश्च रूपात्।

भूयान् मदीय हृदयाम्बुजमध्यवर्ती

श्रीद्वारकानगर-नागर-चक्रवर्ती।।9।।"

(व्रज-मथुरा-द्वारका इन सभी स्थानों की लीला के कर्ता एकमात्र पुष्टिपुरुषोत्तम ही हैं इस तथ्य को प्रशस्त करते हुए आपश्री निवेदन करते हैं) हे श्रीराजाधिराज! रसिकेन्द्रों के शिरोमणि! कभी गोकुल के अधिपति के रूप में तो कभी मथुरा के अधिपति के रूप में अनुभव करानेवाले आप ही हैं। हे श्रीद्वारकेश प्रभु! श्रीद्वारका नगर के नागरिकों के चक्रवर्ती ऐसे आप मेरे हृदयकमल के मध्य विराजमान हों।

"इत्थं व्रजेश्वरविभो रसराजलीला

चाबालराज-कलिता व्यसनान्त दात्री।

सा मे फलिष्यति कदा भवतः प्रसादात्

श्रीद्वारकानगर-नागर-चक्रवर्तिन्।।10।।"

हे रसराज व्रजेश्वर प्रभु! आपकी बाललीला से लेकर राजलीला पर्यंत की रसपूर्ण लीला, जो आपके स्वरूप में क्रमशः प्रेम, आसक्ति और व्यसनावस्था पर्यंत का दान करनेवाली है, वह, श्रीद्वारका नगर के नागरिकों के चक्रवर्ती हे श्रीद्वारकेश प्रभु! आपकी कृपा से मुझे कब फलित होगी?('त्रिविधलीला नामावलि' में श्रीमदाचार्यचरण द्वारा निर्दिष्ट फलश्रुति का स्पष्ट अनुसंधान यहाँ दिखाई देता है।)

विशेष:- श्रीस्वामिनीजी के संग एकान्त कुंज में रसविहार कर रहे श्रीद्वारकेश प्रभु का जो चित्र आज दिया जा रहा है, वह आपश्री ने स्वयं सिद्ध करवाया है, और 'श्रीस्मरण निकुंज' ग्रंथ के मुखपृष्ठ पर प्रसिद्ध किया गया है।

अपने परमाराध्य की स्तुति के बाद आपश्री उनकी हृदयेश्वरी श्रीस्वामिनीजी की दैन्यभावपूर्वक जो स्तुति करते हैं उसका क्रम हम कल से आरंभ करेंगें।

प्रस्तुति : श्रीधर चतुर्वेदी

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