श्रीहरिरायजी गुणानुवाद रसपान

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श्रीहरीरायजी सर्वज्ञ थे। आपश्री की सर्वज्ञता के अनेक प्रसंग हे। आज आपश्री के उत्सव की बधाई प्रारम्भ हुई इस उपलक्ष्य में उनमे से एक प्रसंग को यहाँ स्मरण करे।

आपश्री वि.सं १७१५ के आसपास मेवाड़ में सिंहाड़ पधारे, सिंहाड़ के पास खेड़ा गाव में आप को मुकाम था। यही स्थान पर उदैपुर के राणा रायसिंहजी दर्शन को आये। ये वैष्णव नरेश को श्री हरिरायजी के स्वरुप पे खूब भाव था। तब आप श्री ने राणा जीको भविष्य के बारे में अवगत कराया के यही मेवाड़ की पूण्य भूमि में आगे प्रभु श्रीनाथजी, लालन, श्री विट्ठलनाथजी और श्रीद्वारकाधीशजी पधारेंगे और यही आसपास बिराजेंगे। 

राणा जी ने ये वधाई को श्रवण करीके अति प्रसन्न हुए और श्री हरिरायजी को खिमनोर गांव भेट किया। आपश्री ने वह स्थान पे बिराजकर श्रीमद् भागवत पारायण किया और वेणुगीत पर विशेष वचनामृत किये। जिन के श्रवण अर्थ राणा सहपरिवार नित्य आवते। सो आपके बेठकजी खिमनोर में प्रसिद्द हे।

आपश्री की इच्छा थी के भविष्य में होने वाले यवनो के उपद्रव से पहले ही श्री विठ्ठलनाथजी गोकुल से मेवाड़ पधारे। आप श्री को श्री विठ्ठलनाथजी को सानुभव था। आप ने अनेक वार विनती करी पर प्रभु ने गोकुल छोड़ने की इच्छा नहीं जताई। सो आप ने मेवाड़ पधराना तत्कालीन मुलतवी रखा। फिर जब वि. सं १७२६ में औरंगज़ेब को उपद्रव खूब बढ्यो तब आप ने श्री विठ्ठलेश प्रभु को बिनती करी सो श्लोक:

"यवनारण्य सज्जातवह् निभीता विशेषत:।

कृपादृग्वर्षणेनैव निजा: कार्या अमीयत:।।"

(अर्थात यवन रूपी अरण्य में उत्पन्न दावानल से हम अत्यंत त्रस्त हुए हे सो आप अपनी कृपायुक्त दृष्टिकी वृष्टि से हमें प्लावित करो।)

आपश्री की इस प्रार्थना से प्रसन्न श्रीविठ्ठल नाथजी ने सस्मित हास्य युक्त गोकुल छोड़ने की आज्ञा दी। तब आप ने शीघ्रातिशीघ्र गुप्त रीत से प्रभु को मेवाड़ में खीमनोर पधराये। सो श्रीनाथजी से पहले प्रभु श्री विठलनाथजी मेवाड़ पधारे। सो जब श्रीनाथजी सिंहाड़ पधारे तब श्री हरिरायजी की ही देखरेख और आज्ञा अनुसार नूतन मंदिर सिद्ध हुआ और श्रीजी सुखेन पाट बिराजे।

मेवाड़ पधारने के बाद भी राणा जी प्रायः आपश्री के सन्मुख होते और आपश्री से पुष्टिमार्ग के सिद्धान्त श्रवण करते। पूरा राजपरिवार आपश्री के दर्शन के लिए आता, सो प्रसंग प्रसिद्द हे कैसे आप ने एक राजकुमारी के लौकिक भाव को अलौकिक भाव में रूपांतरित किया।

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