आज का पंचांग

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  • Jeevan Mantra

रवींद्र कुमार ज्योतिष, वास्तु एवं रत्न सलाहकार (राया वाले)

 

|।ॐ।|

आज‬ का पंचांग

 

तिथि.........चतुर्थी

वार...........शुक्रवार

पक्ष... .......कृष्ण

         

नक्षत्र.........पूर्वाभाद्रपद

योग...........सुकर्म

राहु काल.....१०:४६--१२:२७

 

मास............भाद्रपद

ऋतु.............वर्षा

 

कलि युगाब्द....५१२२

विक्रम संवत्....२०७७

 

07   अगस्त   सं  2020

आज का दिन सभी के लिए मंगलमय हो

 

#हरदिनपावन

"7 अगस्त/जन्म-दिवस"

अंतिम सांस तक राष्ट्र-धर्म निभाया :  भानुप्रताप शुक्ल

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और वरिष्ठ पत्रकार श्री भानुप्रताप शुक्ल का जन्म सात अगस्त, 1935 को ग्राम राजपुर बैरिहवाँ, जिला बस्ती( उ.प्र.) में हुआ था। वे अपने पिता पण्डित अभयनारायण शुक्ल की एकमात्र सन्तान थे। उनके जन्म के 12 दिन बाद ही उनकी जन्मदात्री माँ का देहान्त हो गया। इस कारण उनका लालन-पालन अपने नाना पण्डित जगदम्बा प्रसाद तिवारी के घर सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ।

 

भानु जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में पण्डित राम अभिलाष मिश्र के कठोर अनुशासन में पूरी हुई। 1951 में वे संघ के सम्पर्क में आये और 1955 में वे प्रचारक बन गये। भानु जी मेधावी छात्र थे। साहित्य के बीज उनके मन में सुप्तावस्था में पड़े थे। अतः उन्होंने छुटपुट कहानियाँ, लेख आदि लिखने प्रारम्भ कर दिये। यत्र-तत्र उनके प्रकाशन से उनका उत्साह बढ़ने लगा।

 

प्रचारक जीवन में वे कम ही स्थानों पर रहे। उन दिनों संघ की ओर से अनेक हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा था। इनका केन्द्र लखनऊ था। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रान्त प्रचारक भाऊराव देवरस और सहप्रान्त प्रचारक दीनदयाल उपाध्याय इनकी देखरेख करते थे। इन दोनों ने भानु जी की लेखन प्रतिभा को पहचाना और उन्हें लखनऊ बुला लिया। यहाँ उनका सम्पर्क सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर एवं श्रीनारायण चतुर्वेदी जैसे साहित्यकारों से हुआ।

 

लखनऊ आकर भानु जी ने पण्डित अम्बिका प्रसाद वाजपेयी के सान्निध्य में पत्रकारिता के सूत्र सीखे। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और वे राष्ट्रधर्म (मासिक) और फिर तरुण भारत (दैनिक) के सम्पादक बनाये गये। 1975 में आपातकाल लगने पर पांचजन्य (साप्ताहिक) को लखनऊ से दिल्ली ले जाया गया। इसके साथ भानु जी भी दिल्ली आ गये और फिर अन्त तक दिल्ली ही उनकी गतिविधियों का केन्द्र रहा।

 

आपातकाल में भूमिगत रहकर उन्होंने इन्दिरा गान्धी की तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष किया। आगे चलकर वे पांचजन्य के सम्पादक बने। इस नाते उनका परिचय देश-विदेश के पत्रकारों से हुआ। उन्होंने भारत से बाहर अनेक देशों की यात्राएँ भी कीं। 1990 के श्रीराम मन्दिर आन्दोलन में वे पूरी तरह सक्रिय रहे। 31 अक्तूबर और दो नवम्बर, 1990 को हुए हत्याकाण्ड के वे प्रत्यक्षदर्शी थे और इसकी जानकारी पांचजन्य के माध्यम से उन्होंने पूरे देश को दी।

 

1994 में पांचजन्य से अलग होकर वे स्वतन्त्र रूप से देश के अनेक पत्रों में लिखने लगे। ‘राष्ट्रचिन्तन’ नामक उनका साप्ताहिक स्तम्भ बहुत लोकप्रिय हुआ। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं तथा अनेकों का सम्पादन किया। इनमें राष्ट्र जीवन की दिशा, सावरकर विचार दर्शन, अड़तीस कहानियाँ, आँखिन देखी कानन सुनी..आदि प्रमुख हैं। उन्होंने राष्ट्र, ईमानवाले जैसी अनेक वैचारिक पुस्तकों की लम्बी भूमिकाएँ भी लिखीं।

 

कलम के सिपाही भानु जी ने अपने शरीर की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। कैंसर जैसे गम्भीर रोग से पीड़ित होने पर भी उन्होंने लेखन का क्रम नहीं तोड़ा। 17 अगस्त, 2006 को दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने अन्तिम साँस ली। उनके देहान्त से तीन दिन पहले तक उनका साप्ताहिक स्तम्भ ‘राष्ट्रचिन्तन’ देश के अनेक पत्रों में विधिवत प्रकाशित हुआ था।

 

#हरदिनपावन

"7 अगस्त/जन्म-दिवस"

 

ग्राम्य विकास के पुरोधा सुरेन्द्र सिंह चौहान

 

गांव का विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं हो सकता। इसके लिए तो ग्रामवासियों की सुप्त शक्ति को जगाना होगा। म.प्र. के नरसिंहपुर जिले में स्थित मोहद ग्राम के निवासी श्री सुरेन्द्र सिंह चौहान ने इस विचार को व्यवहार रूप में परिणत कर अपने गांव को आदर्श बनाकर दिखाया।

 

‘भैयाजी’ के नाम से प्रसिद्ध श्री सुरेन्द्र सिंह का जन्म सात अगस्त, 1933 को ग्राम मोहद में हुआ था। 1950 से 54 तक जबलपुर में पढ़ते समय वे संघ के स्वयंसेवक बने। इसके बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी में स्वर्ण पदक लेकर एम.ए. किया। वे आठ वर्ष तक एक डिग्री काॅलिज में प्राध्यापक भी रहे; पर उनके मन में अपने गांव के विकास की ललक थी। अतः नौकरी छोड़कर वे गांव आ गये और खेतीबाड़ी में लग गये।

 

संघ की शाखा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा होने के कारण उन्होंने गांव की शाखा को ही ग्राम्य विकास का माध्यम बनाया। अंग्रेजी के विद्वान होने पर भी वे व्यवहार में हिन्दी और संस्कृत का ही प्रयोग करते थे। उनके प्रयास से गांव के सब लोग संस्कृत सीख गये। उनका लेख मोती जैसा सुंदर था। संघ में उन्होंने अपने गांव और जिले के कार्यवाह से लेकर महाकौशल प्रांत के सहकार्यवाह और फिर अखिल भारतीय सह सेवाप्रमुख तक की जिम्मेदारी निभाई। 

 

मधुर वाणी और हंसमुख स्वभाव के धनी सुरेन्द्र जी की गांव में बहुत विशाल पुश्तैनी खेती थी। उसमें सभी जाति-वर्ग के लोग काम करते थे। वे उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानकर उनके दुख-सुख में शामिल होते थे। छुआछूत और ऊंच-नीच आदि से वे मीलों दूर थे। वे कई वर्ष तक गांव के निर्विवाद सरपंच रहे। समाजसेवी अन्ना हजारे की प्रेरणा से संघ ने भी ग्राम्य विकास का काम हाथ में लिया तथा हर जिले में एक गांव को आदर्श बनाने की योजना बनाई; पर इससे बहुत पूर्व सुरेन्द्र जी स्वप्रेरणा से यह काम कर रहे थे। 

 

उनके गांव में कन्याएं रक्षाबंधन पर पेड़ों को राखी बांधती थीं। इससे हजारों पेड़ बच गये। फ्लश के शौचालय बनने से खुले में शौच जाना बंद हुआ। पर्यावरण शुद्धि के लिए घर में, सड़क के किनारे तथा गांव की फालतू भूमि पर फलदार वृक्ष लगवाये। बच्चे के जन्म पर पेड़ लगाने की प्रथा प्रारम्भ हुई।

 

हर घर में तुलसी, फुलवाड़ी एवं गाय, बाहरी दीवार पर ॐ तथा स्वस्तिक के चिन्ह, गोबर गैस के संयंत्र एवं निर्धूम चूल्हे, हर गली में कूड़ेदान, रासायनिक खाद एवं कीटनाशक रहित जैविक खेती आदि प्रयोगों से भी लाभ हुआ। हर इंच भूमि को सिंचित किया गया। विद्यालय में प्रेरक वाक्य लिखवाये गये। अध्यापकों के नियमित आने से छात्र अनुशासित हुए और शिक्षा का स्तर सुधर गया। घरेलू विवाद गांव में ही निबटाये जाने लगे। 53 प्रकार के ग्राम आधारित लघु उद्योग भी खोले गये। उनके गांव में कोई धूम्रपान या नशा नहीं करता था। 

 

ग्राम विकास की सरकारी योजना का अर्थ केवल आर्थिक विकास ही होता है; पर सुरेन्द्र जी ने इससे आगे नैतिकता, संस्कार तथा ‘गांव एक परिवार’ जैसे विचारों पर काम किया। उनके गांव को देखने दूर-दूर से लोग आते थे। इन अनुभवों का लाभ सबको मिले, इसके लिए उन्हें संघ में अखिल भारतीय सह सेवाप्रमुख बनाया गया। उन्होंने किरण, उदय तथा प्रभात ग्राम नामक तीन श्रेणी बनाकर ‘ग्राम्य विकास’ को सामाजिक अध्ययन का विषय बना दिया।

 

विख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख ने चित्रकूट में ‘ग्रामोदय विश्वविद्यालय’ की स्थापना की थी। उन्होंने सुरेन्द्र जी के सफल प्रयोग तथा ग्राम्य विकास के प्रति उनका समर्पण देखकर उन्हें इस वि.वि. का उपकुलपति बनाया। सुरेन्द्र जी ने चार वर्ष तक इस जिम्मेदारी को निभाया। आदर्श ग्राम, स्वावलम्बी ग्राम तथा आदर्श हिन्दू परिवार के अनेक नये प्रयोगों के सूत्रधार श्री सुरेन्द्र सिंह चौहान का एक फरवरी, 2013 को अपने गांव मोहद में ही निधन हुआ।

 

#हरदिनपावन

"7 अगस्त/जन्म-दिवस'

पुरातत्ववेत्ता  : डा. वासुदेवशरण अग्रवाल

 

ऐतिहासिक मान्यताओं को पुष्ट एवं प्रमाणित करने में पुरातत्व का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। सात अगस्त, 1904 को ग्राम खेड़ा (जिला हापुड़, उ.प्र) में जन्मे डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही एक मनीषी थे, जिन्होंने अपने शोध से भारतीय इतिहास की अनेक मान्यताओं को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।

 

वासुदेव शरण जी ने 1925 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से कक्षा 12 की परीक्षा प्रथम श्रेणी में तथा राजकीय विद्यालय से संस्कृत की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनकी प्रतिभा देखकर उनकी प्रथम श्रेणी की बी.ए की डिग्री पर मालवीय जी ने स्वयं हस्ताक्षर किये। इसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम.ए. तथा कानून की उपाधियाँ प्राप्त कीं। इस काल में उन्हें प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डा. राधाकुमुद मुखर्जी का अत्यन्त स्नेह मिला।

 

कुछ समय उन्होंने वकालत तथा घरेलू व्यापार भी किया; पर अन्ततः डा. मुखर्जी के आग्रह पर वे मथुरा संग्रहालय से जुड़ गये। वासुदेव जी ने रुचि लेकर उसे व्यवस्थित किया। इसके बाद उन्हें लखनऊ प्रान्तीय संग्रहालय भेजा गया, जो अपनी अव्यवस्था के कारण मुर्दा अजायबघर कहलाता था।

 

1941 में उन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय ने पाणिनी पर शोध के लिए पी-एच.डी की उपाधि दी। 1946 में भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख डा0 मार्टिमर व्हीलर ने मध्य एशिया से प्राप्त सामग्री का संग्रहालय दिल्ली में बनाया और उसकी जिम्मेदारी डा0 वासुदेव शरण जी को दी। 1947 के बाद दिल्ली में राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय स्थापित कर इसका काम भी उन्हें ही सौंपा गया। उन्होंने कुछ ही समय बाद दिल्ली में एक सफल प्रदर्शिनी का आयोजन किया। इससे उनकी प्रसिद्धि देश ही नहीं, तो विदेशों तक फैल गयी।

 

पर दिल्ली में डा. व्हीलर तथा उनके उत्तराधिकारी डा. चक्रवर्ती से उनके मतभेद हो गये और 1951 में वे राजकीय सेवा छोड़कर काशी विश्वविद्यालय के नवस्थापित पुरातत्व विभाग में आ गये। यहाँ उन्होंने ‘कालिज ऑफ़ इंडोलोजी’ स्थापित किया। यहीं रहते हुए उन्होंने हिन्दी तथा अंग्रेजी में लगभग 50 ग्रन्थों की रचना की। 

 

इनमें भारतीय कला, हर्षचरित: एक सांस्कृतिक अध्ययन, मेघदूत: एक सांस्कृतिक अध्ययन, कादम्बरी: एक सांस्कृतिक अध्ययन, जायसी पद्मावत संजीवनी व्याख्या, कीर्तिलता संजीवनी व्याख्या, गीता नवनीत, उपनिषद नवनीत तथा अंग्रेजी में शिव महादेव: दि ग्रेट ग१ड, स्टडीज इन इंडियन आर्ट.. आदि प्रमुख हैं।

 

डा. वासुदेवशरण अग्रवाल की मान्यता थी कि भारतीय संस्कृति ग्राम्य जीवन में रची-बसी लोक संस्कृति है। अतः उन्होंने जनपदीय संस्कृति, लोकभाषा, मुहावरे आदि पर शोध के लिए छात्रों को प्रेरित किया। इससे हजारों लोकोक्तियाँ तथा गाँवों में प्रचलित अर्थ गम्भीर वाक्यों का संरक्षण तथा पुनरुद्धार हुआ। उनके काशी आने से रायकृष्ण दास के ‘भारत कला भवन’ का भी विकास हुआ।

 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के वंशज डा. मोतीचन्द्र तथा डा. वासुदेव शरण के संयुक्त प्रयास से इतिहास, कला तथा संस्कृति सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हुए। उनकी प्रेरणा से ही डा. मोतीचन्द्र ने ‘काशी का इतिहास’ जैसा महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। वासुदेव जी मधुमेह से पीड़ित होने के बावजूद अध्ययन, अध्यापन, शोध और निर्देशन में लगे रहते थे। इसी रोग के कारण 27 जुलाई को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अस्पताल में उनका निधन हुआ।

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