“किसलिए कतरा के जाता है मुसाफ़िर, दम तो ले, आज सूखा पेड़ हूँ ... कल तेरा साया मैं ही था।“

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“किसलिए कतरा के जाता है मुसाफ़िर, दम तो ले 

आज सूखा पेड़ हूँ ... कल तेरा साया मैं ही था। “

अब्राहम अश्क़ जी की पंक्तियाँ निम्न स्थिति पर सटीक बैठती हैं ..

चित्र में दिखाए गए स्मृति मार्ग और शिला ...स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ..साहित्य रत्न स्वर्गीय श्री चिंतामणि जी शुक्ल के सम्मान में सन २००० में उनके पुत्र स्वर्गीय श्री विजय कृष्ण जी शुक्ल के अथक प्रयासों से मथुरा छावनी रेल्वे स्टेशन से उनके निवास स्थल कृष्णापुरी को जोड़ने वाले मार्ग पर सेठ बी॰ऐन॰पोद्दर विद्यालय के ठीक बायें स्थान पर स्थापित किया गया था ...

स्थानीय प्रशासन द्वारा उचित देखरेख न होने के कारण धीरे-धीरे जीर्ण होता गया .. और अंततः विगत पाँच सालों में विलुप्त हो गया ..

फिर और कुछ कृतघ्न पदाधिकारियों ने वहाँ शौचालय बनवाकर वाहवाही लूट ली ..

उनकी पुत्रवधू एवम् मेरी माँ श्रीमती डा॰ संतोष शुक्ल जी द्वारा पुनर्स्थापना का प्रयास करने हेतु कई सम्बंधित सज्जनों से बात करने पर जो तर्क और बहाने सुनने को मिले, उनसे हम सभी का मन व्यथित और बहुत निराश है ..अपनी बात के सत्यापन के लिए वो लोग साक्ष्य माँग रहे हैं ..जो दिन में कई बार यहाँ से गुज़रते हैं।

विडम्बना ये कि

जिनकी लिखी अनगिनत पुस्तकों को मथुरा और आसपास के अनेक ज़िलों के राजनीतिक इसिहास के रूप में साक्ष्य की मान्यता प्रदत्त थी ..आज उनके सम्मान को अस्तित्व के साक्ष्य का आश्रय है। 

संलग्न चित्र संयोग  से मेरे  पास उपलब्ध था, तो प्रस्तुत कर रहा हूं। 

यदि ये मात्र पारिवारिक कर्तव्य है ..तो पौत्र होने के नाते मैं सदैव प्रयासरत रहूँगा कि महान व्यक्तित्व ..जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी नि:स्वार्थ भाव से भारत के विकास में योगदान दिया ..उनको उनकी ही कर्मस्थली में एक धरोहर के समान सहेजकर रख सकूँ ..परंतु व्यावसायिक वचनबद्धता के कारण लगातार समय दे पाने में असमर्थ हूँ...तो समय लग सकता है।

अतः मैं अपील करना चाहता हूं ..

और यदि देश, नगर वासी अपना कर्तव्य समझें तो ..सहयोग दें ..जब तक कि उद्देश्य पूरा न हो ..

जय हिंद ...जय भारत

मनीष शुक्ला कृष्णापुरी मथुरा

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