तृतीय गृह त्रयोदश गृहाधीश श्रीव्रजभूषणलालजी महाराज(चतुर्थ) - 4

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  • Jeevan Mantra

प्रस्तुति : श्रीधर चतुर्वेदी

।।श्रीद्वारकेशो जयति।।

तृतीय गृह गौरवगान

प्रसंग:- 227

 

श्रीव्रजभूषणलालजी के यज्ञोपवीत, ब्रह्मसम्बन्ध दीक्षा, तिलकायितत्व की प्राप्ति एवं तत्पश्चात् आयोजित छप्पनभोग मनोरथ का विवरण कल के प्रसंग में पढ़ने के बाद, आज उनके विवाह और आगे के अध्ययन का घटनाक्रम देखते हैं।

 

"सं.1980 चैत्र शु.11 के दिन लघुभ्राता श्रीविट्ठलनाथजी के यज्ञोपवीत संस्कार के अनन्तर श्रीव्रजभूषणलालजी का विवाह प्रस्ताव नाथद्वारा के तिलकायित श्रीगोवर्द्धनलालजी महाराज के आग्रह से उनकी दौहित्री के साथ निश्चित किया गया। इस समय महाराजश्री की वय यद्यपि 12 वर्ष की थी, और उनका विद्याध्ययन का क्रम प्रचलित था, तथापि मातृश्री के वात्सल्य और नाथद्वाराधीश के अतिशय आग्रह से यह मंगलमय प्रस्ताव निश्चित हो गया।

सं.1980 वैशाख शु.4 के दिन नाथद्वारा में महाराजश्री का विवाह बागरोदी व्रजभूषणलालाजी जयपुर- निवासी की आयुष्मती कन्या से सम्पन्न हुआ। इस समय गोवर्द्धनलालजी महाराज और महाराजश्री की मातृश्री ने मन खोलकर इस शुभ प्रस्ताव को सम्पादित किया, और आगत समाज का स्वागत तथा प्रबन्ध किया।"

 

"महाराजश्री और उनके लघुभ्राता श्रीविट्ठलनाथजी के प्रौढ़ एवं सघन अध्ययन हेतु समय-समय पर जिन विद्वान् अध्यापकों की नियुक्ति की गई उनके नाम इस प्रकार हैं:-

-गोधरानिवासी पं.बापूदेव शास्त्री

-प्रतापगढ़निवासी पं.जगन्नाथ शास्त्री

-दतियानिवासी पं.बालकृष्ण शास्त्री

-पं.कण्ठमणि शास्त्री

-मथुरानिवासी पं.गोपालजी चतुर्वेद

-ध्राफानिवासी पं.जटाशंकर शास्त्री"

 

"महाराजश्री तथा उनके भ्राता दोनों की विद्याभिरुचि और अभिभावकों की सतर्क-पूर्ण देखरेख से ऐसा फल हुआ, जिससे महाराजश्री की विद्वत्ता की चारों ओर प्रशंसा होने लगी। साम्प्रदायिक तत्त्वज्ञता, व्याख्यान- शैली और व्यवहार-दक्षता आदि सभी गुणों में महाराजश्री ने अपनी छोटी वय से ही योग्यता व्यक्त की, जिससे वे समय पर एक आदर्श न्यायप्रिय, विद्याकला-प्रेमी, उत्तम उपदेष्टा और व्यवहारकुशल विद्वान् और संस्थान के योग्य तिलकायित हो सके। 'मयूर की सन्तति निसर्ग से ही चित्रित हुआ करती है, उसके लिए केवल समय की आवश्यकता होती है', बस यही बात महाराजश्री के लिए चरितार्थ हुई। उनकी शिक्षा-दीक्षा आदि के लिए किसी निमित्त की आवश्यकता थी, जिसे पाकर समय ने उन्हें स्वयं योग्यता के सिंहासन पर विराजमान कर दिया।"

 

"सं.1985 में महाराजश्री ने बनारस- गवर्नमेन्ट-संस्कृत कालेज की व्याकरण-प्रथमा परीक्षा देकर अच्छे नंबरों से उत्तीर्णता प्राप्त की, और तदनन्तर व्याकरण-मध्यमा एवं शुद्धाद्वैत-सिद्धान्तों के आकर ग्रन्थों का अध्ययन किया। साथ ही गणित, इँगलिश, हिंदी-साहित्य आदि का अध्ययन कर अन्य सर्वविध आवश्यक परिज्ञान प्राप्त किया।"

 

आज के प्रसंग का यहीं पर समापन करते हैं। कल महाराजश्री के व्यापक प्रदेश-प्रवास, और मथुरास्थित श्रीराजाधिराज मन्दिर में सुवर्ण हिन्डोला महोत्सव का वृत्तांत देखेंगें।

 

आज एक ऐसा प्राचीन-दुर्लभ चित्र यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें बाल्यवय के श्रीव्रजभूषणलालजी अपने भ्राता श्रीविट्ठलनाथजी के साथ श्रीद्वारकाधीश प्रभु के सम्मुख प्रणाम की मुद्रा में उपस्थित हैं।

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