तृ.गृ.गो.श्रीव्रजेशकुमारजी महाराजश्री कृत "श्रीराधिका स्तवनम् "।

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प्रस्तुति - श्रीधर चतुर्वेदी

तृ.गृ.गो.श्रीव्रजेशकुमारजी महाराजश्री कृत "श्रीराधिका स्तवनम् "।

इस अद्भुत-अलौकिक स्तोत्र के तीन श्लोकों का रसास्वाद... अब तक हम कर चुके हैं...। आइए...आज चतुर्थ श्लोक का रसपान करते हैं...!!!

श्लोक :- 4

श्रीविट्ठलेशगुणावृता ज्ञानामृतस्य च वर्षिणी 

कुंजे स्ववर्णिम कान्तितो नीलं च पीतमवस्थितौ।

गोवर्द्धनाद्रिमखे हरेः शक्तिस्वरूप समास्थिता चाह्लादिनी व्रजभूषणाSभक्तान्सदाभयदायिनी।।

श्रीराधिका भवतारिणी दूरीकरोतु ममापदम्। गोवर्द्धनोद्धरणेन साकं कुंज मण्डप शोभिनी।।

भावार्थ :--

(अज्ञानी को ज्ञान का प्रकाश देने वाले) श्रीविट्ठलेश के गुणों से परिपूर्ण... और ज्ञानामृत की वर्षा करनेवालीं... श्रीप्रभु के श्रीअंग की नील कांति एवं अपने श्रीअंग की पीत कांति से शोभायमान कुंज में विराजमान... ऐसीं आप ही... श्रीप्रभु द्वारा व्रजजनों से करवाये गये गोवर्धनयाग के प्रसंग में श्रीप्रभु ने 

जब गोवर्धन धारण किया तब..."गोपाये स्वात्मयोगेन" भगवद्वचन अनुसार... श्रीप्रभु की आत्मशक्ति के रूप में प्रकट हुईं हैं। 

सात दिन और सात रात्रि पर्यंत के उस अवसर में...समस्त व्रजजनों को आह्लादित करनेवालीं... और...भक्तों को सदा अभय प्रदान करनेवालीं... 

हे व्रजभूषणा! श्रीप्रभु की आह्लादिनी शक्ति आप ही हैं...!!! श्रीगोवर्धनधरण के संग कुंजमण्डप में शोभायमान...संसारसिंधु से पार उतारनेवालीं... 

हे श्रीराधिकाजी! मेरी आपत्ति दूर कीजिए...!!!

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