मथुरा- होलिका की धधकती आग से निकला पंडा, फिर दोहराई गई 5200 साल पुरानी परंपरा

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मथुरा। 03 मार्च 2026

होली के पावन पर्व पर मथुरा के फालैन गाँव में एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिला, जिसमें एक संजू पंडा बिना डरे धधकती होलिका की भस्मास्पद लपटों से सुरक्षित बाहर निकल गया। इस अद्भुत परंपरा का संबंध भक्त प्रह्लाद की कथा से है, इसलिए फालैन को ‘प्रह्लाद नगरी’ भी कहा जाता है। वहाँ मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने इस चमत्कारी घटना को देखा और जयकारों की गूँज से माहौल भक्तिमय हो गया।

पौराणिक कथा की प्रेरणा

ग्रामवासियों के अनुसार यह परंपरा प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा को याद दिलाती है। पुराणों में वर्णित है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रह्लाद को जलाने की कोशिश की, मगर प्रह्लाद भगवान की भक्ति के आगे अग्नि से बच गए। उसी लीला को श्रद्धापूर्ण रूप से मनाने के लिए हर वर्ष गाँव के ब्राह्मण समाज से किसी युवक को ‘पंडा’ चुना जाता है, और इस बार भी गाँव वालों ने संजू पंडा को यह जिम्मेदारी सौंपी है। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा करीब 5200 वर्ष पुरानी मानी जाती है। पिछले वर्षों में संजू पंडा के पिता सुशील पंडा और बड़े भाई मोनू पंडा ने भी यह साहसिक कार्य किया है।

तपस्या से तैयार हुआ युवक

शाम होते ही होलिका दहन के लिए गाँव में विशाल होलिका तैयार की गई। संजू पंडा कुछ सप्ताह से कठिन व्रत और तपस्या में जुटे हुए थे। बताया गया है कि उन्होंने वसंत पंचमी से ही प्रह्लाद मंदिर में रहकर दिन-रात पूजा-अर्चना की और केवल फलाहार ग्रहण किया। इस दौरान उन्होंने ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन किया और कोई चमड़ी का सामान या जूता नहीं पहना। बस एक अंगवस्त्र पर ही निर्भर रहते हुए संजू निरंतर साधना करते रहे।

चमत्कारी अग्निपरीक्षा

रात के मध्यरात्रि के बाद सुबह करीब चार बजे, प्रह्लाद मंदिर में भगवान को अर्पित दीपक की लौ में ठंडक का संकेत मिला। संजू पंडा ने तुरंत होलिका की ओर बढ़ने का इशारा किया। गाँव वालों ने विशाल होलिका में आग प्रज्वलित कर दी। संजू सिर पर गमछा और गले में रुद्राक्ष मालाएं धारण कर करीब 20–25 फुट ऊँची होलिका के बीच से दौड़ पड़े। बीच रास्ते में उन्होंने प्रह्लाद देवता को प्रणाम करते हुए बिना हिचके धधकती आग के बीच से निकलकर कुछ ही क्षण में दूसरी ओर सुरक्षित बाहर आ गए। भीड़ दंग रह गई; लोगों ने जोर-जोर से ‘भक्त प्रह्लाद की जय’ और ‘बांके बिहारी की जय’ के नारों से स्वागत किया।

उमड़ा आस्था का जनसैलाब

इस आयोजन को देखने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पहुंचे। मैदान में रंग-बिरंगी टोलीयों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर लोकगीत गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। आसपास के लगभग बारह गाँव के लोग एक साथ होलिका उत्सव में शामिल हुए। ग्रामीणों के अनुसार यह आयोजन सनातन संस्कृति की जीवंत परंपरा का अनूठा उदाहरण है।

होलिका का भव्य निर्माण

ग्राम प्रधान ने बताया कि होलिका मिट्टी की ईंटों और कठोर लकड़ी से तैयार की जाती है। इस बार होलिका लगभग 20–25 फुट ऊँची और 30 फुट चौड़ी थी। गाँव के प्रत्येक घर से ईंट जुटाई गईं, जबकि प्रधान ने झारबेरिया (राजस्थान) से विशेष लकड़ियाँ मँगवाए थे। लपटें इतनी भयंकर थीं कि 10–12 फुट की दूरी से भी लोग सुरक्षित नहीं रह पा रहे थे; पास आते ही ऐसा लग रहा था मानो अग्नि तन-बदन को जला दे।

आस्था और उत्साह का संगम

फालैन की यह होलिका दहन परंपरा गहरी आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुकी है। यह आयोजन भगवान प्रह्लाद की अटूट भक्ति की याद दिलाता है और सनातन परंपरा को जीवंत रखता है। जो भी व्यक्ति इस घटना का साक्षी बना, उसने इसे चमत्कार ही कहा। होली की रात फालैन गाँव में संजू पंडा की अद्भुत अग्निपरीक्षा ने सभी को आश्चर्य और श्रद्धा से भर दिया। यह अद्भुत अनुभव श्रद्धालुओं में आशा, धैर्य और अटूट विश्वास की भावना को और भी प्रगाढ़ कर गया।

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