आज‬ का पंचांग

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  • Jeevan Mantra

रवींद्र कुमार ज्योतिष, वास्तु एवं रत्न सलाहकार (राया वाले)

 

|।ॐ।|

 

तिथि.........षष्टी

वार...........सोमवार

पक्ष... .......कृष्ण

         

नक्षत्र.........अश्विनी

योग...........शूल

राहु काल.....०७:२७--०९:०७

 

मास............भाद्रपद

ऋतु.............वर्षा

 

कलि युगाब्द....५१२२

विक्रम संवत्....२०७७

 

10   अगस्त   सं  2020

*आज का दिन सभी के लिए मंगलमय हो*

 

#हर_दिन_पावन

"10 अगस्त/रोचक-प्रसंग"

*लोकतन्त्र के सेनानी डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी*

 

प्रयाग उच्च न्यायालय से अपने विरुद्ध आये निर्णय से बौखलाकर 26 जून, 1975 की रात में इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल थोप दिया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद तथा मंत्रिमंडल के सभी सदस्य इंदिरा गांधी से डरते थे। उन सबने बिना चूं-चपड़ किये इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिये। विपक्ष के सभी प्रमुख नेताओं को रात में ही घरों से उठाकर जेलों में ठूंस दिया गया। सारे देश में दहशत फैल गयी। पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसर थोप दिया गया। 

 

इसके विरुद्ध संघ के नेतृत्व में देश भर में लोकतंत्र प्रेमियों ने सत्याग्रह किया और चुनाव में इंदिरा गांधी को हराकर फिर से लोकतंत्र की स्थापना की। इस दौर में 10 अगस्त, 1976 की एक घटना से डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने देश और विदेश में ख्याति पाई। उन दिनों वे जनसंघ की ओर से राज्यसभा के सदस्य थे। उनके विरुद्ध भी गिरफ्तारी का वारंट था; पर वे एक सिख युवक के वेश में चेन्नई और वहां से श्रीलंका होते हुए अमरीका चले गये। अमरीका में वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापक बन गये।

 

इधर राज्यसभा में लगातार अनुपस्थिति के कारण उनकी सदस्यता समाप्त होने का खतरा था। ऐसे में 10 अगस्त, 1976 को वे अचानक संसद में प्रस्तुत हो गये। राज्यसभा के सभापति श्री बी.डी.जत्ती श्रद्धांजलि वक्तव्य पढ़ रहे थे। इसी बीच खड़े होकर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा, ‘‘मान्यवर आपने लोकतंत्र को श्रद्धांजलि नहीं दी। उसकी भी तो मृत्यु हो चुकी है।’’

 

सुब्रह्मण्यम स्वामी को देखते ही वहां हड़कम्प मच गया। कई सांसद तो डर के मारे कुर्सियों की नीचे छिप गये। श्री जत्ती ने सबसे दो मिनट मौन रखने को कहा। इस बीच श्री स्वामी संसद भवन से निकलकर अपनी कार से बिड़ला मंदिर आ गये। यहां उन्होंने अपनी कार खड़ी कर दी। उस समय संजय गांधी  की जनसभा के बाद एक जुलूस निकल रहा था। वे कपड़े बदल कर उसमें शामिल होकर रेलवे स्टेशन आ गये। वहां से मथुरा, नागपुर, मुंबई, नेपाल और फिर अमरीका पहुंच गये। भारत सरकार हाथ मलती रह गयी।

 

संसद में प्रस्तुत होने के दो दिन बाद बी.बी.सी लंदन से उनका एक वक्तव्य प्रसारित हुआ। इससे भारत सरकार के मुंह पर कालिख पुत गयी; पर सच यह था कि तब तक वे भारत में ही थे। जो वक्तव्य लंदन से प्रसारित हुआ, उसे वे पहले ही रिकार्ड करा कर भारत आये थे। इसमें पूरी दुनिया में फैले संघ के स्वयंसेवकों तथा कई विदेशी सरकारों ने उनका सहयोग किया। इससे श्री स्वामी पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गये। जैसे छत्रपति शिवाजी औरंगजेब की जेल से निकल भागे थे, वैसा ही चमत्कार उन्होंने किया था।

 

15 सितम्बर, 1939 को मायलापुर (चेन्नई) में श्री सीताराम सुब्रह्मण्यम के घर जन्मे डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी राजनीति में भी सक्रिय हैं। वे आई.आई.टी, दिल्ली में प्राध्यापक, चंद्रशेखर मंत्रिमंडल में केन्द्रीय वित्त मंत्री तथा योजना आयोग के सदस्य रहे हैं। प्रखर हिन्दुत्ववादी श्री स्वामी ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं। श्री रामसेतु आंदोलन को परिणति तक पहुंचाने का श्रेय उन्हें ही है।

 

वे कानून के भी अच्छे ज्ञाता हैं। अतः न्यायालय में अपने मुकदमे स्वयं लड़ते हैं। शासकीय भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाये जा रहे उनके अभियान से कई घोटालों से परदा उठा है तथा कई बड़े लोगों को जेल जाना पड़ा है।

 

#हर_दिन_पावन

"10 अगस्त/जन्म-दिवस"

*आधुनिक भामाशाह जी.पुल्लारेड्डी

 

पैसा तो बहुत लोग कमाते हैं; पर उसे समाज हित में खुले हाथ से बांटने वाले कम ही होते हैं। लम्बे समय तक विश्व हिन्दू परिषद के कोषाध्यक्ष रहे भाग्यनगर (हैदराबाद) निवासी श्री गुड़मपल्ली पुल्लारेड्डी ऐसे ही आधुनिक भामाशाह थे, जिन्होंने दो हाथों से धन कमाकर उसे हजार हाथों से बांटा।

 

श्री पुल्लारेड्डी का जन्म एक जनवरी, 1921 को आंध्रप्रदेश के करनूल जिले के गोकवरम नामक गांव के एक निर्धन परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री हुसैन रेड्डी तथा माता श्रीमती पुलम्मा थीं। पढ़ाई में रुचि न होने के कारण जैसे-तैसे कक्षा पांच तक की शिक्षा पाकर अपने चाचा की आभूषणों की दुकान पर आठ रुपये मासिक पर काम करने लगे। दुकान के बाद और पैसा कमाने के लिए उन्होंने चाय, मट्ठा और कपड़ा भी बेचा।

 

आगे चलकर इन्होंने मिठाई का काम शुरू किया। वे मिठाई की गुणवत्ता और पैकिंग पर विशेष ध्यान देते थे। इससे व्यापार इतना बढ़ा कि अपनी पत्नी, बेटों, दामादों आदि को भी इसी में लगा लिया। अपनी 10 दुकानों के लगभग 1,000 कर्मचारियों को वे परिवार का सदस्य ही मानते थे। 

 

उनके मन में निर्धन और निर्बल वर्ग के प्रति बहुत प्रेम था। एक बार तो दिन भर की बिक्री का पैसा उन्होंने दुकान बंद करते समय एक अनाथालय के प्रबंधक को दे दिया। आगे चलकर उन्होंने ‘जी. पुल्लारेड्डी धर्मार्थ न्यास’ बनाया, जिसके द्वारा इस समय 18 विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी व मैडिकल क१लिज, चिकित्सालय, विकलांग सेवा संस्थान, छात्रावास आदि चल रहे हैं।

 

श्री रेड्डी ने विश्व हिन्दू परिषद को तो पर्याप्त धन दिया ही; पर धन संग्रह करने वाले लोग भी तैयार किये। मधुर व्यवहार के कारण वे विरोधियों से भी धन ले आते थे। ई.टी.वी. के मालिक रामोजी राव नास्तिक थे; पर वे उनसे सवा लाख रु. और 72 वर्षीय एक उद्योगपति से 72,000 रु. ले आये। 

वे सभी सामाजिक कामों में सहयोग करते थे। श्री सत्यसांई बाबा के 70 वें जन्मदिवस पर वे 70,000 लड्डू बनवाकर ले गये। एक बार सूखा पड़ने पर वामपंथियों को अच्छा काम करता देख उन्होंने वहां भी 50,000 रु. दिये। हैदराबाद नगर के मध्य में उनकी एक एकड़ बहुत मूल्यवान भूमि थी। वह उन्होंने इस्कॉन वालों को मंदिर बनाने के लिए निःशुल्क दे दी। हैदराबाद में दंगे के समय कर्फ्यू लगने पर वे निर्धन बस्तियों में भोजन सामग्री बांटकर आते थे।

 

हैदराबाद में गणेशोत्सव के समय प्रायः मुस्लिम दंगे होते थे। श्री रेड्डी ने 1972 में ‘भाग्यनगर गणेशोत्सव समिति’ बनाकर इसे भव्य रूप दे दिया। आज तो मूर्ति विसर्जन के समय 25,000 मूर्तियों की शोभायात्रा निकलती है तथा 30 लाख लोग उसमें भाग लेते हैं। सभी राजनेता इसका स्वागत करते हैं। इससे हिन्दुओं के सभी जाति, मत तथा पंथ वाले एक मंच पर आ गये।

 

श्री रेड्डी राममंदिर आंदोलन में बहुत सक्रिय थे। उनका जन्मस्थान करनूल मुस्लिम बहुल है। शिलान्यास तथा बाबरी ढांचे के विध्वंस के समय वे अयोध्या में ही थे। यह देखकर स्थानीय मुसलमानों ने करनूल की उनकी दुकान जला दी। इससे उन्हें लाखों रुपये की हानि हुई; पर वे पीछे नहीं हटे। वर्ष 2006 में विश्व हिन्दू परिषद को मुकदमों के लिए बहुत धन चाहिए था। उन्होंने श्री अशोक सिंहल को स्पष्ट कह दिया कि चाहे मुझे अपना मकान और दुकान बेचनी पड़े; पर परिषद को धन की कमी नहीं होने दूंगा।

 

इसी प्रकार सक्रिय रहते हुए श्री रेड्डी ने 9 मई 2007 को अंतिम सांस ली। उनके परिवारजन भी उनके आदर्श का अनुसरण करते हुए विश्व हिन्दू परिषद और सामाजिक कामों में सक्रिय हैं।

 

#हर_दिन_पावन

"10 अगस्त/जन्म-दिवस"

*संगीत सम्राट पं. विष्णु नारायण भातखण्डे*

 

आज जिस सहजता से हम शास्त्रीय संगीत सीख सकते हैं, उसे विकसित करने में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का अप्रतिम योगदान है। उनका जन्म 10 अगस्त, 1860 (जन्माष्टमी) को मुंबई में हुआ था। उनकी शिक्षा पहले मुंबई और फिर पुणे में हुई। वे व्यवसाय से वकील थे तथा मुंबई में सॉलिसीटर के रूप में उनकी पहचान थी। संगीत में रुचि होने के कारण छात्र जीवन में ही उन्होंने श्री वल्लभदास से सितार की शिक्षा ली। इसके बाद कंठ संगीत की शिक्षा श्री बेलबागकर, मियां अली हुसैन खान तथा विलायत हुसैन से प्राप्त की। 

 

पत्नी तथा बेटी की अकाल मृत्यु से वे जीवन के प्रति अनासक्त हो गये। उसके बाद अपना पूरा जीवन उन्होंने संगीत की साधना में ही समर्पित कर दिया। उन दिनों संगीत की पुस्तकें प्रचलित नहीं थीं। गुरु-शिष्य परम्परा के आधार पर ही लोग संगीत सीखते थे; पर पंडित जी इसे सर्वसुलभ बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि संगीत का कोई पाठ्यक्रम हो तथा इसके शास्त्रीय पक्ष के बारे में भी विद्यार्थी जानें। 

 

वे देश भर में संगीत के अनेक उस्तादों व गुरुओं से मिले; पर अधिकांश गुरू उनसे सहमत नहीं थे। अनेक संगीतज्ञ तो अपने राग तथा बंदिशें सबको सुनाते भी नहीं थे। कभी-कभी तो अपनी किसी विशेष बंदिश को वे केवल एक बार ही गाते थे, जिससे कोई उसकी नकल न कर ले। ध्वनिमुद्रण की तब कोई व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में पंडित जी इन उस्तादों के कार्यक्रम में पर्दे के पीछे या मंच के नीचे छिपकर बैठते थे तथा स्वरलिपियां लिखते थे। इसके आधार पर बाद में उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे।

 

आज छात्रों को पुराने प्रसिद्ध गायकों की जो स्वरलिपियां उपलब्ध हैं, उनका बहुत बड़ा श्रेय पंडित भातखंडे को है। संगीत के एक अन्य महारथी पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भी इनके समकालीन थे। ये दोनों ‘द्विविष्णु’ के नाम से विख्यात थे। जहां पंडित पलुस्कर का योगदान संगीत के क्रियात्मक पक्ष को उजागर करने में रहा, वहां पंडित भातखंडे क्रियात्मक और सैद्धांतिक दोनों पक्ष में सिद्धहस्त थे। 

 

देश की भावी पीढ़ी को संगीत सीखना सुलभ हो सके, इसके लिए पंडित जी ने हिन्दुस्तानी संगीत तथा कर्नाटक संगीत पद्धति का गहन अध्ययन कर ‘स्वर मालिका’ नामक पुस्तक लिखी। रागों की पहचान सुलभता से हो सके, इसके लिए ‘थाट’ को आधार माना। इसी प्रकार कर्नाटक संगीत शैली के आधार पर ‘लक्षण गीतों’ का गायन प्रारम्भ किया।

 

पंडित जी ने अनेक संगीत विद्यालय प्रारम्भ किये। वे चाहते थे कि संगीत की शिक्षा को एक सुव्यवस्थित स्वरूप मिले। उनकी प्रतिभा को पहचान कर बड़ौदा नरेश ने 1916 में अपनी रियासत में संगीत विद्यालय स्थापित किया। इसके बाद ग्वालियर महाराजा ने भी इसकी अनुमति दी, जो आज ‘माधव संगीत महाविद्यालय’ के नाम से विख्यात है। 1926 में उन्होंने लखनऊ में एक विद्यालय खोला, जिसका नाम अब ‘भातखंडे संगीत विद्यालय’ है। पंडित जी द्वारा बनाये गये पाठ्यक्रम को पूरे भारत में आज भी मान्यता प्राप्त है।

 

संगीत से सामान्य जनता को जोड़ने के लिए उन्होंने ‘अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन’ प्रारम्भ किये। इसमें कोई भी अपनी कला का प्रदर्शन कर सकता था। इससे कई पीढ़ी के संगीतज्ञों को एक साथ मंच पर आने का अवसर मिला। 1933 में उनके पांव की हड्डी टूट गयी। इसके बाद उन्हें पक्षाघात भी हो गया। तीन वर्ष तक वे बीमारी से संघर्ष करते रहे; पर अंततः सृष्टि के अटल विधान की जीत हुई और पंडित जी का 19 सितम्बर 1936 (गणेश चतुर्थी) को देहांत हो गया। उनकी स्मृति में 1961 में उनके जन्म दिवस (जन्माष्टमी) पर भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया।

 

 

#हर_दिन_पावन

"10 अगस्त/पुण्य-तिथि"

*आदर्श कार्यकर्ता  मधुकर राव भागवत*

 

संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के पिता श्री मधुकर राव भागवत एक आदर्श गृहस्थ कार्यकर्ता थे। गुजरात की भूमि पर संघ बीज को रोपने का श्रेय उन्हें ही है। विवाह से पूर्व और बाद में भी प्रचारक के नाते उन्होंने वहां कार्य किया। वे गुजरात के प्रथम प्रांत प्रचारक थे।

 

श्री मधुकर राव का जन्म नागपुर के पास चन्द्रपुर में हुआ। उनके पिता श्री नारायण राव भागवत सुप्रसिद्ध वकील तथा जिला संघचालक थे। मधुकर राव 1929 में चंद्रपुर में ही स्वयंसेवक बने। डा. हेडगेवार से उनका निकट संपर्क था। मैट्रिक उत्तीर्ण करते तक वे तृतीय वर्ष प्रशिक्षित हो गये। 

 

संघ के घोष और संगीत में उनकी अच्छी रुचि थी। उनके निर्देशन में श्री हरि विनायक दात्ये ने ‘गायनी कला’ नामक एक पुस्तक भी लिखी थी। पुणे से बी.एस-सी कर उन्होंने 1941 में श्री एकनाथ रानाडे के साथ कटनी (म.प्र.) में प्रचारक के नाते काम किया। इसके बाद उन्हें गुजरात में संघ कार्य प्रारम्भ करने के लिए भेजा गया। उन्होंने क्रमशः सूरत, बड़ोदरा तथा कर्णावती में शाखा प्रारम्भ कीं।

 

गुजरात और महाराष्ट्र की भाषा, खानपान और जीवनशैली में अनेक अंतर हैं। मधुकर राव ने शीघ्र ही कई गुजराती परम्पराएं अपना लीं। वे शाखा में आने वाले मराठी स्वयंसेवकों से भी गुजराती बोलने का आग्रह करते थे। मधुर स्वभाव के कारण वे हर मिलने वाले पर अमिट छाप छोड़ते थे। 1943-44 से पूरे उत्तर भारत और सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) के प्रशिक्षण वर्ग गुजरात में होने लगे। ऐसे एक वर्ग में श्री लालकृष्ण आडवाणी भी आये थे।

 

माता जी के देहांत के कारण मधुकर राव को विवाह करना पड़ा। कुछ समय बाद पिताजी का भी देहांत हो गया; पर वे इनसे विचलित नहीं हुए। घर का वातावरण संभलते ही वे फिर निकल पड़े। पहले उन्हें श्री गुरुजी के साथ प्रवास की जिम्मेदारी दी गयी। फिर उन्हें गुजरात में प्रांत प्रचारक बनाया गया। 

 

1947 में राजकोट तथा कर्णावती में हुए शिविरों में 4,000 से भी अधिक स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में भाग लिया था। 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने तक उनके संगठन कौशल से गुजरात के 115 नगरों में शाखा प्रारम्भ हो गयीं। प्रतिबंध काल में वे जेल में रहे तथा बाद में 1951 तक प्रांत प्रचारक रहे।

 

प्रचारक जीवन से लौटक्र मधुकर राव ने नागपुर से कानून की उपाधि ली। उस समय उन पर नागपुर नगर और फिर प्रांत कार्यवाह की जिम्मेदारी थी। चंद्रपुर में वकालत प्रारम्भ करते समय वे जिला और फिर विभाग संघचालक बने। उनकी पत्नी श्रीमती मालतीबाई भी राष्ट्र सेविका समिति, भगिनी समाज, वनवासी कल्याण आश्रम, जनसंघ आदि में सक्रिय थीं। 1975 के आपातकाल में पति-पत्नी दोनों गिरफ्तार हुए। बड़े पुत्र श्री मोहन भागवत अकोला में भूमिगत रहकर कार्य कर रहे थे। छोटे पुत्र रंजन ने नागपुर विद्यापीठ में सत्याग्रह किया। इस प्रकार पूरे परिवार ने तानाशाही के विरुद्ध हुए संघर्ष में आहुति दी।

 

संघ कार्य के साथ-साथ चंद्रपुर की अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी मधुकर राव सक्रिय रहते थे। चंद्रपुर में विधि क१लिज की स्थापना के बाद अनेक वर्ष तक उन्होंने वहां निःशुल्क पढ़ाया। लोकमान्य तिलक स्मारक समिति के वे अध्यक्ष थे। 70 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के लिए हुई कारसेवा में भाग लिया। वे हर तरह से एक आदर्श कार्यकर्ता थे।

 

श्री मधुकर राव भागवत का 85 वर्ष की आयु में 10 अगस्त, 2001 को निधन हुआ। उनके प्रशंसक तथा गुजरात के मुख्य मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें संगठन शास्त्र का जीवंत विश्वविद्यालय ठीक ही कहा है।

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