आज‬ का पंचांग

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  • Jeevan Mantra

रवींद्र कुमार ज्योतिष, वास्तु एवं रत्न सलाहकार (राया वाले)

 

|।ॐ।|

 

तिथि.........पंचमी

वार...........शनिवार

पक्ष... .......कृष्ण

         

नक्षत्र.........उतराभाद्रपद

योग...........सुकर्म

राहु काल.....०९:०७--१९:४७

 

मास............भाद्रपद

ऋतु.............वर्षा

 

कलि युगाब्द....५१२२

विक्रम संवत्....२०७७

 

08   अगस्त   सं  2020

*आज का दिन सभी के लिए मंगलमय हो*

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#हर_दिन_पावन

"8 अगस्त/जन्म-दिवस"

*सुरों की सिद्धेश्वरी*

 

8 अगस्त, 1908 को वाराणसी (उ.प्र.) में जन्मी सिद्धेश्वरी देवी अपने जीवन काल में निर्विवाद रूप से ठुमरी की साम्राज्ञी मान ली गयी थीं।  इनके पिता श्री श्याम तथा माता श्रीमती चंदा उर्फ श्यामा थीं। जब ये डेढ़ वर्ष की ही थीं, तब इनकी माता का निधन हो गया। अतः इनका पालन इनकी नानी मैनाबाई ने किया, जो एक लोकप्रिय गायिका व नर्तकी थीं। 

 

उस काल में गाने व नाचने वालों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। महिला कलाकारों को तो वेश्या ही मान लिया जाता था। ऐसे समय में सिद्धेश्वरी देवी ने अपनी कला के माध्यम से भरपूर मान और सम्मान अर्जित किया।

 

सिद्धेश्वरी देवी का बचपन का नाम गोनो था। उन्हें सिद्धेश्वरी देवी नाम प्रख्यात विद्वान व ज्योतिषी पंडित महादेव प्रसाद मिश्र (बच्चा पंडित) ने दिया। सिद्धेश्वरी देवी ने संगीत की शिक्षा पंडित सिया जी मिश्र, पंडित बड़े रामदास जी, उस्ताद रज्जब अली खां और इनायत खां आदि ने दी। ईश्वर प्रदत्त जन्मजात प्रतिभा के बाद ऐसे श्रेष्ठ गुरुओं का सान्निध्य पाकर सिद्धेश्वरी देवी  गीत-संगीत के क्षेत्र में एक प्रसिद्ध हस्ती बन गयीं।

 

सिद्धेश्वरी देवी को पहली बार 17 साल की अवस्था में सरगुजा के युवराज के विवाहोत्सव में गाने का अवसर मिला। उनके पास अच्छे वस्त्र नहीं थे। ऐसे में विद्याधरी देवी ने इन्हें वस्त्र दिये। वहां से सिद्धेश्वरी देवी का नाम सब ओर फैल गया। एक बार तो मुंबई के एक समारोह में वरिष्ठ गायिका केसरबाई इनके साथ ही उपस्थित थीं। जब उनसे ठुमरी गाने को कहा गया, तो उन्होंने कहा कि जहां ठुमरी साम्राज्ञी सिद्धेश्वरी देवी हांे, वहां मैं कैसे गा सकती हूं। अधिकांश बड़े संगीतकारों का भी यही मत था कि मलका और गौहर के बाद ठुमरी के सिंहासन पर बैठने की अधिकार सिद्धेश्वरी देवी ही हैं।

 

सिद्धेश्वरी देवी ने उषा मूवीटोन की कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया; पर शीघ्र ही वे समझ गयीं कि उनका क्षेत्र केवल गायन है। उन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलन में खुलकर तो भाग नहीं लिया; पर उसके लिए वे आर्थिक सहायता करती रहती थीं। उन दिनों वे अपने कार्यक्रमों में यह भजन अवश्य गाती थीं।

 

मथुरा न सही गोकुल न सही, रहो वंशी बजाते कहीं न कहीं।

 

दीन भारत का दुख अब दूर करो, रहो झलक दिखाते कहीं न कहीं।।

 

सिद्धेश्वरी देवी ने श्रीराम भारतीय कला केन्द्र, दिल्ली और कथक केन्द्र में नये कलाकारों को ठुमरी सिखाई। इन्होंने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल तथा अनेक यूरोपीय देशों में जाकर भारतीय ठुमरी की धाक जमाई। उन्होंने राजाओं और जमीदारों के दरबारों से अपने प्रदर्शन प्रारम्भ किये और बढ़ते हुए आकाशवाणी और दूरदर्शन तक पहुंचीं। जैसे-जैसे समय और श्रोता बदले, उन्होंने अपने संगीत में परिवर्तन किया, यही उनका सफलता का रहस्य था।

 

सिद्धेश्वरी देवी को अपने जीवन काल में साहित्य कला परिषद सम्मान, उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी सम्मान, केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी सम्मान जैसे अनेक सम्मान प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया। 26 जून, 1976 को उन पर पक्षाघात का आक्रमण हुआ और 17 मार्च, 1977 की प्रातः वे ब्रह्मलीन हो गयीं। उनकी पुत्री सविता देवी भी प्रख्यात गायिका हैं। उन्होंने अपनी मां की स्मृति में 'सिद्धेश्वरी देवी एकेडेमी अ१फ म्यूजिक' की स्थापना की है। इसके माध्यम से वे प्रतिवर्ष संगीत समारोह आयोजित कर वरिष्ठ संगीत साधकों को सम्मानित करती हैं।

 

#हर_दिन_पावन

"8 अगस्त/जन्म-दिवस"

*पंडवानी गायिका तीजनबाई*

 

पांडवों की वाणी (पंडवानी) छत्तीसगढ़ के वनवासी अंचलों में प्रचलित लोकगायन की एक विशिष्ट शैली है। इसमें महाभारत के विभिन्न प्रसंग तथा पात्रों के बीच संवाद प्रस्तुत किये जाते हैं। गाने के साथ ही इसमें चेहरे के हावभाव और हाथ में लिये तंबूरे की क्रियाओं का भी विशेष महत्व है।

 

इस पंडवानी गायन को विश्वप्रसिद्ध करने वाली लोकगायिका तीजनबाई का जन्म आठ अगस्त, 1956 को भिलाई के पास अटारी गांव में हुआ था; पर उसका अधिक समय पास के ग्राम गनियारी में अपने नाना ब्रजलाल जी के पास बीतता था। इनके पिता श्री झुनुकलाल पारधी तथा माता श्रीमती सुखवती बाई थीं। पारधी एक घुमंतू जनजाति है, जिनका कोई स्थायी ठिकाना तथा काम नहीं होता। वनों में घूमते हुए ही इनका जीवन बीत जाता है। अतः इस जनजाति के बच्चे पढ़ भी नहीं पाते। तीजनबाई का बचपन भी इसी तरह बीता।

 

जब घर के सब युवा सदस्य रोटी-रोजी की व्यवस्था करने जंगल में चले जाते थे, तब घर पर वृद्ध नाना जी और तीजन ही रह जाते थे। ऐसे में नाना जी प्रायः पंडवानी गाते थे। तीजन की बुद्धि तीव्र और स्मरणशक्ति अद्भुत थी। कुछ ही समय में उसे पूरी कथा याद हो गयी। कभी-कभी वह भी नाना जी के साथ सुर मिलाने लगती थी। नाना जी को लगा कि वह एक अच्छी गायिका हो सकती है। अतः वे उसे मनोयोग से पंडवानी सिखाने लगे।

 

पुरुष प्रधान पारधी जनजाति में कोई लड़की पंडवानी गाये, यह एक नयी बात थी। अतः समाज के लोगों के साथ तीजन के माता-पिता ने भी इसका विरोध किया; पर नाना जी को तीजन में एक विख्यात गायिका के लक्षण दिखाई दे रहे थे। अतः उन्होंने अपने प्रयास जारी रखे। उन्होंने तीजन को उपहार में एक तंबूरा भी दिया, जो आज भी हर कार्यक्रम में उनके हाथ में रहता है।

 

तीजन का उत्साह बढ़ाने के लिए उनके नाना जी ने अपने गांव में ही उसके कुछ कार्यक्रम कराये। उनमें वह भजन और फिल्मी गीत गाती थी। कुछ समय बाद तीजन को प्रायः सपने में आकर कोई स्त्री कहती कि फिल्मी गीत छोड़ो और तंबूरे की शरण लेकर केवल पंडवानी ही गाओ। इसे ईश्वरीय संकेत समझकर तीजन पूर्णतः पंडवानी को समर्पित हो गयीं। कुछ समय बाद उन्होंने श्री उमेद सिंह से प्रशिक्षण लेकर अपनी मंडली बना ली तथा निकटवर्ती उत्सव और मेलों में जाने लगीं। पंडवानी की दो शैली हैं। बैठ कर गाने वाली वेदमती शैली तथा खड़े होकर गाने वाली कापालिक शैली। महिलाएं प्रायः बैठकर गाती थीं; पर तीजनबाई ने कापालिक शैली को अपनाया।

 

उन दिनों उन्हें एक कार्यक्रम में केवल सौ रु. मिलते थे। अतः आर्थिक समस्या सदा बनी रहती थी। एक बार विख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सम्मुख उनका गायन कराया। इससे वे देश भर में प्रसिद्ध हो गयीं। 1986 में एक समारोह में उनकी प्रस्तुति देखकर भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंधक श्री संगमेश्वरम् ने उन्हंे स्थाई नौकरी दे दी। इस प्रकार नियमित आय होने से तीजन को अभ्यास के लिए पूरा समय मिलने लगा।

 

इसके बाद तो सफलता एवं प्रसिद्धि का उनका रथ कभी रुका नहीं। वे भारत के हर राज्य के साथ ही विश्व के कई देशों में पंडवानी गायन कर चुकी हैं। पद्मभूषण तथा सैकड़ों अन्य सम्मानों से विभूषित तीजनबाई इस प्रकार भारतीय संस्कृति की सुगंध पूरी दुनिया में बिखेर रही हैं। 

 

#हर_दिन_पावन

"8 अगस्त/राज्याभिषेक-दिवस"

*प्रतापी राजा कृष्णदेव राय*

 

एक के बाद एक लगातार हमले कर विदेशी मुस्लिमों ने भारत के उत्तर में अपनी जड़ंे जमा ली थीं। अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को एक बड़ी सेना देकर दक्षिण भारत जीतने के लिए भेजा। 1306 से 1315 ई. तक इसने दक्षिण में भारी विनाश किया। ऐसी विकट परिस्थिति में हरिहर और बुक्का राय नामक दो वीर भाइयों ने 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। 

 

इन दोनों को बलात् मुसलमान बना लिया गया था; पर माधवाचार्य ने इन्हें वापस हिन्दू धर्म में लाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करायी। लगातार युद्धरत रहने के बाद भी यह राज्य विश्व के सर्वाधिक धनी और शक्तिशाली राज्यों में गिना जाता था। इस राज्य के सबसे प्रतापी राजा हुए कृष्णदेव राय। उनका राज्याभिषेक 8 अगस्त, 1509 को हुआ था।

 

महाराजा कृष्णदेव राय हिन्दू परम्परा का पोषण करने वाले लोकप्रिय सम्राट थे। उन्होंने अपने राज्य में हिन्दू एकता को बढ़ावा दिया। वे स्वयं वैष्णव पन्थ को मानते थे; पर उनके राज्य में सब पन्थों के विद्वानों का आदर होता था। सबको अपने मत के अनुसार पूजा करने की छूट थी। उनके काल में भ्रमण करने आये विदेशी यात्रियों ने अपने वृत्तान्तों में विजयनगर साम्राज्य की भरपूर प्रशंसा की है। इनमें पुर्तगाली यात्री डोमिंगेज पेइज प्रमुख है।

 

महाराजा कृष्णदेव राय ने अपने राज्य में आन्तरिक सुधारों को बढ़ावा दिया। शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाकर तथा राजस्व व्यवस्था में सुधार कर उन्होंने राज्य को आर्थिक दृष्टि से सबल और समर्थ बनाया। विदेशी और विधर्मी हमलावरों का संकट राज्य पर सदा बना रहता था, अतः उन्होंने एक विशाल और तीव्रगामी सेना का निर्माण किया। इसमें सात लाख पैदल, 22,000 घुड़सवार और 651 हाथी थे।

 

महाराजा कृष्णदेव राय को अपने शासनकाल में सबसे पहले बहमनी सुल्तान महमूद शाह के आक्रमण का सामना करना पड़ा। महमूद शाह ने इस युद्ध को ‘जेहाद’ कह कर सैनिकों में मजहबी उन्माद भर दिया; पर कृष्णदेव राय ने ऐसा भीषण हमला किया कि महमूद शाह और उसकी सेना सिर पर पाँव रखकर भागी। इसके बाद उन्होंने कृष्णा और तुंगभद्रा नदी के मध्य भाग पर अधिकार कर लिया। महाराजा की एक विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने जीवन में लड़े गये हर युद्ध में विजय प्राप्त की।

 

महमूद शाह की ओर से निश्चिन्त होकर राजा कृष्णदेव राय ने उड़ीसा राज्य को अपने प्रभाव क्षेत्र में लिया और वहाँ के शासक को अपना मित्र बना लिया। 1520 में उन्होंने बीजापुर पर आक्रमण कर सुल्तान यूसुफ आदिलशाह को बुरी तरह पराजित किया। उन्होंने गुलबर्गा के मजबूत किले को भी ध्वस्त कर आदिलशाह की कमर तोड़ दी। इन विजयों से सम्पूर्ण दक्षिण भारत में कृष्णदेव राय और हिन्दू धर्म के शौर्य की धाक जम गयी।

 

महाराजा के राज्य की सीमाएँ पूर्व में विशाखापट्टनम, पश्चिम में कोंकण और दक्षिण में भारतीय प्रायद्वीप के अन्तिम छोर तक पहुँच गयी थीं। हिन्द महासागर में स्थित कुछ द्वीप भी उनका आधिपत्य स्वीकार करते थे। राजा द्वारा लिखित ‘आमुक्त माल्यदा’ नामक तेलुगू ग्रन्थ प्रसिद्ध है। राज्य में सर्वत्र शान्ति एवं सुव्यवस्था के कारण व्यापार और कलाओं का वहाँ खूब विकास हुआ।

 

उन्होंने विजयनगर में भव्य राम मन्दिर तथा हजार मन्दिर (हजार खम्भों वाले मन्दिर) का निर्माण कराया। ऐसे वीर एवं न्यायप्रिय शासक को हम प्रतिदिन एकात्मता स्तोत्र में श्रद्धापूर्वक स्मरण करते है।

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