ब्रज कला केंद्र का रंगमंच सिंधीयत से हुआ सराबोर

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राम खत्री/किशोर स्वर्ण इसरानी। मथुरा 15 जनवरी 2026

सिंधी - हिंदी की परिभाषा खोली, संस्कृति की भाषा बोली। विभाजन की धूप में भी
जो छाँव बनकर ठहरे,
वो भाषा नहीं,
वो मूल्य थे
जो भारत में आकर निखरे। हम बात कर रहे हैं उस सिंधी समाज की जिनके लिए हिंदी बनी सेतु , सिंधी बनी आत्मा, दोनों ने मिलकर गढ़ी, एक सशक्त भारत की कथा। सिंधी बच्चों ने हिंदी भाषी जमीन पर सिंधीयत को किया बुलंद और दी एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां। 4 से 18 वर्ष तक के बच्चों ने सिंधी लोकगीत, भजन, कविताएं और नृत्य प्रस्तुत कर सिंधी संस्कृति की अद्भुत छटा बिखेरी।

मौका था सिंधी बोली भाषा के प्रचार प्रसार और सिंधी संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, सिंधी मातृशक्ति संस्कार मंच की मेजबानी में मंगलवार को वृंदावन मार्ग स्थित ब्रज कला केंद्र के ऑडोटोरियम में उप्र सिंधी अकादमी द्वारा आयोजित सिंधी सांस्कृतिक चटाभेटी कार्यक्रम का, जिसमें विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर "हिंदी - सिंधी में समानता तथा राष्ट्र निर्माण में सिंधी संस्कृति" विषयक संगोष्ठी भी हुई।

लखनऊ से आए उप्र सिंधी अकादमी के निदेशक अभिषेक कुमार अखिल ने कहा कि सिंधी बोली भाषा के उत्थान के लिए माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में उप्र सिंधी अकादमी द्वारा प्रदेशभर में विविध आयोजन कराए जा रहे हैं, लेकिन अपनी बोली भाषा को बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसी समाज की ही होती है। हिंदी - सिंधी में काफी समानताएं है तथा राष्ट्र निर्माण में सिंधी संस्कृति का भी अहम योगदान है।

वरिष्ठ वक्ता नारायण दास लखवानी ने कहा कि सिंधी - हिंदी बोली-भाषा और संस्कृति को बनाए रखने पर गहरा चिंतन मंथन भविष्य में मील का पत्थर साबित होगा। समाजसेवी रामचंद्र खत्री ने सिंधी बोली-भाषा को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए कहा कि हम अपने परिवार और समाज में आपसी बातचीत सिंधी में ही करें, इसके लिए मातृशक्तियों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि वह ही संस्कार दे सकती हैं।

अध्यापिका ज्योति घावरी ने कहा कि सिंधी और हिंदी भाषाएँ विरोधी नहीं, बल्कि सहायक भाषाएँ हैं। इनकी समानता इन्हें जोड़ती है और संभावनाएँ इन्हें भविष्य की ओर ले जाती हैं। यदि दोनों भाषाओं को साथ लेकर चला जाए, तो संस्कृति, शिक्षा और समाज सभी समृद्ध होंगे। भूमिका केवलानी ने कहा कि हमें गर्व है कि हम सिंधी हैं क्योंकि सिंधी समाज का उदय सिंधु नदी सिंधु घाटी से हुआ है, जिसका अस्तित्व अखंड भारत की प्राचीन मुअन जो दड़ो सभ्यता से जुड़ा है।

कार्यक्रम संयोजिका गीता नाथानी एवं कार्यक्रम की निर्णायक अनिता चावला एडवोकेट ने सिंधी जनरल पंचायत, भारतीय सिंधु सभा, लाड़ी लोहाणा सिंधी पंचायत, जिए सिंध सेवा संगम, सिंधी वेलफेयर फाउंडेशन मिशन स्माइल, सिंधी महिला मंडल, सिंधी नवयुवक मंडल आदि संगठनों और बच्चों के अभिभावकों की प्रशंसा करते हुए आभार जताया और कहा कि हम सबको जोड़ने का सूत्र सिंधीयत ही है।

कार्यक्रम के सूत्रधार युवा विचारक किशोर इसरानी ने सिंधी बोली को ही अपनी पहचान बनाने पर बल देते हुए कहा कि हिंदी भाषा हमारी मौसी है जो बहुत प्यारी है और सिंधी बोली हमारी मां है जो बहुत जरूरी है।

इस मौके पर उप्र सिंधी अकादमी के निदेशक अभिषेक कुमार अखिल, कार्यक्रम संयोजक गीता नाथानी, निर्णायक अनिता चावला एडवोकेट, कार्यक्रम के सूत्रधार किशोर इसरानी,  अध्यक्ष.नारायण दास लखवानी,
 वरिष्ठ उपाध्यक्ष रामचंद्र खत्री, बसंत लाल मंगलानी प्रदीप उक्रानी जीवतराम चदानी गुरमुख दास गंगवानी सुरेश मेठवानी  ज्योति घावरी, भूमिका केवलानी, भारती केवलानी, मनीषा अंदानी, कोमल नाथानी, चंद्रा खत्री, रजनी इसरानी, महक वाधवानी, ज्योति भाटिया, कविता मंगलानी आदि मातृशक्तियां तथा अकादमी के वरिष्ठ असिस्टेंट रवि यादव सहित तमाम गणमान्यजन शामिल थे। कार्यक्रम का सफल संचालन हेमा गंगवानी ने किया।

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