राजस्थान में स्वामी लीलाशाह की तपोभूमि देख मथुरा के सिंधीजन गदगद हो गए

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राम खत्री/ किशोर इसरानी। मथुरा 05 अगस्त 2026

श्रीझूलेलाल चालिया महोत्सव के अंतर्गत महाराज स्वामी पंडित मोहनलाल शर्मा जी के मार्गदर्शन में तृतीय दिव्य दर्शन यात्रा में शामिल लगभग छ दर्जन सिंधीजन इस बार राजस्थान के खैरथल स्थित वल्लभग्राम में स्वामी लीलाशाह की तपोभूमि कुटिया गए। मंगलवार सुबह दो बसों से निकले ब्रज के सिंधीजन दोपहर को सिंधियों के गांव के रूप में प्रसिद्ध वल्लभग्राम पहुंचे और सांय खैरथल के झूलेलाल मंदिर के दर्शनों का लाभ प्राप्त कर देररात्री वापस भी लौट आए।

मथुरा से गए सिंधीजनों का स्वामी लीलाशाह सेवा समिति और पूज्य सिंधी पंचायत वल्लभग्राम के लगभग 40 सक्रिय सदस्यों द्वारा सेवाभाव के साथ स्वागत सत्कार किया गया, तदोपरांत सभी ने स्वामी लीलाशाहजी महाराज की दिव्य आदमकद प्रतिमा के दर्शन कर सुकून प्राप्त किया, सभी को ऐसा अहसास हो रहा था कि स्वामी लीलाशाहजी साक्षात खड़े हो, सभी भक्तजन गदगद हो गए, यहां के स्थानीय बुजुर्ग भक्तों ने स्वामी लीलाशाहजी के सच्चे प्रसंग सुनाएं तो सभी भावविभोर हो गए, सभी ने श्रद्धाभाव के साथ पूजा अर्चना और आरती की और सत्संग किया। स्थानीय सिंधी कलाकारों द्वारा भक्ति गीत प्रस्तुत किए गए, जिस पर भक्तगण झूम उठे। मथुरा के भक्तों द्वारा स्वामी लीलाशाहजी जी एवं भगवान झूलेलाल जी को ऐसी माला समर्पित गई, जो मथुरा के छोटे छोटे बच्चों ने अपने हाथों से जय झूलेलाल एवं जय राम जी लिखी कतरनों को पुष्प रूपी माला के रूप में पिरोया था।

मीडिया प्रभारी किशोर इसरानी ने बताया कि भारत के विभाजन के समय सिंध प्रांत से विस्थापित होकर आए सिंधी हिंदू परिवारों को 1948 में तत्कालीन सरकार ने पहाड़ियों की ओट में वीरान बंजर भूमि पर बसाया था, उसी दौरान स्वामी लीलाशाहजी जब यहां आए तो उन्होंने इस भूमि को अपनी तपस्या के लिए चुना और 1952 में इस पावन कुटिया का निर्माण करवाया और भूमिगत कक्ष बेसमेंट में रहकर लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इसे एक जागृत तपोभूमि माना जाता है, जहाँ ध्यान करने से गहरी मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है। स्वामी जी की प्रेरणा से सिंधी परिवारों ने संघर्ष, अटूट हौसले और आध्यात्म के बल पर एक जीवंत गाथा लिखी और शून्य से शुरुआत करके इस बंजर भूमि को एक समृद्ध और आदर्श बस्ती में तब्दील कर दिया। सिंधी परिवारों की कड़ी मेहनत के कारण ही 1953 में देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर इस क्षेत्र का नाम वल्लभग्राम रखा गया था, जिसे अब "सिंधियों का गांव" (Sindhi's Village) के नाम से भी जाना जाता है। यह कुटिया सिंधी समुदाय के गौरव और उनकी सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। वल्लभग्राम स्थित स्वामी लीलाशाह कुटिया के आंतरिक दृश्यों और इसकी भव्यता को देखने के बाद भक्त भावविभोर हो गए।

महाराज स्वामी पंडित मोहनलाल शर्मा के साथ वल्लभग्राम खैरथल गए नारायणदास लखवानी, बसंत मंगलानी, जीवतराम चंदानी, सुरेश मेठवानी, जितेंद्र लालवानी, रमेश नाथानी, गीता नाथानी, किशोर इसरानी, अनिल मंगलानी, भगवानदास बेबू, अशोक डाबरा, कन्हैयालाल एडवोकेट, रमेश केवलानी, अशोक लालवानी, जगदीश अंदानी, दिपक टेकवानी, ललित नाथानी, ईश्वर आडवानी, काकूभाई, चेतन खत्री, शंकर, गिरधारी सहित तमाम सिंधीजनों ने इस यात्रा को अद्भुत बताया। इसमें महिलाओं और युवाओं की भागीदारी उत्साहजनक रही।

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