संस्कृति विवि में विद्वानों ने बताए वित्तीय एवं डिजिटल साक्षरता के लाभ

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किशन चतुर्वेदी। मथुरा 11 फरवरी 2026

संस्कृति विश्वविद्यालय ने सामुदायिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए सेमिनार हॉल में वित्तीय एवं डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला का आयोजन संस्कृति विश्वविद्यालय, एनआईआई फाउंडेशन, महिंद्रा फाइनेंस और सिस्को के द्वारा मिलकर किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, प्रशासनिक कर्मचारियों, प्रशिक्षकों और सामुदायिक प्रतिनिधियों कोआधुनिक वित्तीय प्रणाली और डिजिटल परिदृश्य की जटिलताओं को समझने और उनका प्रभावी उपयोग करने के लिए आवश्यक कौशल प्रदान किए गए।
आईक्यूएसी के निदेशक डॉ. पंकज कुमार गोस्वामी ने अपने स्वागत भाषण में कार्यशाला के उद्देश्य को स्पष्ट किया
और इसे संस्कृति विश्वविद्यालय के समग्र छात्र विकास और सामाजिक कल्याण के दृष्टिकोण से जोड़ा। उन्होंने
कहा कि डिजिटल साक्षरता लोगों को सूचना तक पहुंचने, प्रभावी संचार करने, ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग
करने और साइबर खतरों से बचने में सक्षम बनाती है, जिससे सीखने, रोजगार और उत्पादकता में वृद्धि होती है।
वहीं, वित्तीय साक्षरता लोगों को बजट प्रबंधन, बचत, निवेश और जिम्मेदार उधार के बारे में समझ प्रदान करती
है, जिससे बेहतर वित्तीय योजना और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है। दोनों मिलकर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा
देते हैं, धोखाधड़ी के जोखिम को कम करते हैं और डिजिटल विभाजन को पाटते हैं।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रो–वाइस चांसलर, प्रो. रघुरामा भट्ट ने वित्तीय और डिजिटल साक्षरता को भारत के “अमृत
काल” के लिए अनिवार्य बताया और इन पहलों के लिए संस्थागत समर्थन का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि
साक्षरता केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सूचना, तकनीक, धन, मीडिया, स्वास्थ्य,
पर्यावरण, संस्कृति और भावनाओं की समझ भी शामिल है, जो व्यक्तिगत विकास और सामाजिक जिम्मेदारी के
लिए आवश्यक है।
एनआईटी फाउंडेशन (दिल्ली) के राष्ट्रीय प्रमुख अखिलेश शर्मा ने डिजिटल स्किलिंग के राष्ट्रीय रुझानों पर विस्तृत
जानकारी दी। उन्होंने साइबर अपराध के बढ़ते खतरे जैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी, पहचान चोरी, फिशिंग, हैकिंग,
डेटा उल्लंघन और सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल सुरक्षा के प्रति
जागरूकता की कमी लोगों को वित्तीय नुकसान के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसीलिए डिजिटल जागरूकता,
मजबूत साइबर कानून और बेहतर सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं। राजेश गोस्वामी (लोकेशन लीड एवं मास्टर ट्रेनर) ने व्यावहारिक सत्रों का संचालन किया, जिसमें लाइव प्रदर्शन के माध्यम से तकनीकी अवधारणाओं को समझाया गया। 
कार्यशाला में 150 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। सभी ने सक्रिय रूप से चर्चा, प्रश्नोत्तर और व्यावहारिक सत्रों में भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ट्रेनिंग आफ ट्रेनर था, जिसके तहत प्रशिक्षित मास्टर ट्रेनर
अन्य लोगों को प्रशिक्षण देने के लिए तैयार किए गए। इस मॉडल में तैयारी, प्रशिक्षण, मूल्यांकन और फॉलो-अप
जैसे चरण शामिल थे, जिससे प्रतिभागी भविष्य में स्वयं प्रशिक्षण दे सकें। एक विशेष सत्र डिजी लाकर पर केंद्रित था, जो भारत सरकार का सुरक्षित डिजिटल दस्तावेज भंडारण मंच है। इसमें आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज सुरक्षित रूप से संग्रहित किए जा सकते हैं। प्रशिक्षकों ने लाइव अकाउंट बनाने और दस्तावेज साझा करने की प्रक्रिया दिखाई। सरकारी बचत योजनाओं पर भी विस्तृत चर्चा की गई, जिसमें उनकी सुरक्षा, लाभ और कर छूट पर जोर दियागया। इसके साथ ही संचार सार्थी पोर्टल की जानकारी दी गई, जो मोबाइल नंबर धोखाधड़ी से बचाव में मदद करता है।
कार्यशाला के दौरान साइबर अपराध जागरूकता सत्र में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 (संशोधित 2008) के तहत अपराधों परचर्चा की गई। प्रतिभागियों को सुरक्षित पासवर्ड, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल cybercrime.gov.in के उपयोग के बारे में बताया गया।
कार्यक्रम में संस्कृति विश्वविद्यालय के इंक्युबेशन सेंटर के सीईओ डॉ. गजेन्द्र सिंह, प्रो. रेनू गुप्ता, प्रो. गंगाधर, प्रो. कंचन सिंह, डॉ. रजनी भट्ट सहित कई लोग उपस्थित थे। एनआईआईटी फाउंडेशन की ओर से सहायक प्रशिक्षक देवेंद्र सिंह, रोशन गिरी, अरविंद सिंह, शैलेंद्र सिंह और अनूप शर्मा भी उपस्थित रहे।

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