ऐसे मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होकर यमदण्ड से पीड़ित होकर चिरकाल तक नरक में पड़े रहते हैं . . .

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  • Jeevan Mantra

महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 145 में अन्धत्व और पंगुत्व आदि दोषों और रोगों के कारणभूत दुष्कर्मों का वर्णन हुआ है।[1]

शिव-उमा संवाद

उमा ने कहा- भगवन! मेरी प्रीति बढ़ाने वाले देवदेवेश्वर! इस संसार में कुछ लोग जन्म से ही अन्धे दिखायी देते हैं और कुछ लोगों के जन्म लेने के पश्चात् उनकी आँखें नष्ट हो जाती हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताने की कृपा करें।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- प्रिये! जो पूर्वजन्म में काम या स्वेच्छाचारवश पराये घरों में अपनी लोलुपता का परिचय देते हैं और परायी स्त्रियों पर अपनी दूषित दृष्टि डालते हैं तथा जो मनुष्य क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर दूसरों को अन्धा बना देते हैं, अथवा रूपविषयक लक्षणों को जानकर उसका मिथ्या प्रदर्शन करते हैं। ऐसे आचार वाले मनुष्य मृत्यु को प्रापत होने पर यमदण्ड से दण्डित हो चिरकाल तक नरकों में पड़े रहते हैं। उसके बाद यदि वे मनुष्ययोनि में जन्म लेते हैं, तब स्वभावतः अन्धे होते हैं अथवा जन्म लेने के बाद अन्धे हो जाते हैं या सदा ही नेत्ररोग से पीड़ित रहते हैं। इस विषय में विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

 

उमा ने पूछा- प्रभो! कुछ मनुष्य सदा मुख के रोग से व्यथित रहते हैं, दाँत, कण्ठ और कपोलों के रोग से अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, कुछ तो जन्म से ही रोगी होते हैं और कुछ जन्म लेने के बाद कारणवश उन रोगों के शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताइये।।

 

श्री महेश्वर ने कहा- देवि! एकाग्रचित्त होकर सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। जो कुवाक्य बोलने वाले मनुष्य अपनी जिह्वा से गुरुजनों या दूसरों के प्रति अत्यन्त, कड़वे, झूठे, रूखे तथा घोर वचन बोलते हैं, जो क्रोध के कारण दूसरों की जीभ काट लेते हैं अथवा जो कार्यवश प्रायः अधिकाधिक झूठ ही बोलते हैं, उनके जिह्वाप्रदेश में ही रोग होते हैं। जो परदोष और निन्दादियुक्त कुवचन सुनते हैं तथा जो दूसरों के कानों को हानि पहुँचाते हैं, वे दूसरे जन्म में कर्ण-सम्बन्धी नाना प्रकार के रोगों का कष्ट भोगते हैं। ऐसे ही लोगों को दन्तरोग, शिरोरोग, कर्णरोग तथा अन्य सभी मुखसम्बन्धी दोष अपनी करनी के फलरूप से प्राप्त होते हैं।

 

उमा ने पूछा- देव! मनुष्यों में कुछ लोग सदा कुक्षि और पक्षसम्बन्धी दोषों तथा उदरसम्बन्धी रोगों से पीड़ित रहते हैं। कुछ लोगों के उदर में तीखे शूल से उठते हैं, जिनसे वे बहुत पीड़ित होते और दुःख में डूब जाते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! पहले जो मनुष्य काम और क्रोध के अत्यन्त वशीभूत हो दूसरों की परवा न करके केवल अपने ही लिये आहार जुटाते और खाते हैं, अभक्ष्य भोजन का दान करते हैं, विश्वस्त मनुष्यों को जहर दे देते हैं, न खाने योग्य वस्तुएँ खिला देते हैं, शौच और मंगलाचार से रहित होते हैं, शोभने! ऐसे आचरण वाले लोग पुनर्जन्म लेने पर किसी तरह मानव शरीर को पाकर उन्हीं रोगों से पीड़ित होते हैं। देवि! नाना प्रकार के रूप वाले उन रोगों से पीड़ित हो वे दुःख में निमग्न हो जाते हैं। पूर्वजन्म में जैसा किया था वैसा भोगते हैं।

 

उमा ने पूछा- देव! बहुत से मनुष्य प्रमेहसम्बन्धी रोगों से पीड़ित देखे जाते हैं, कितने ही पथरी और शर्करा (पेशाब से चीनी आना) आदि रोगों के शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताने की कृपा करें।[1]

 

श्री महेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्म में परायी स्त्रियों का सतीत्व नष्ट करने वाले होते हैं, जो धूर्त मानव पशुयोनि में मैथुन के लिये चेष्टा करते हैं, रूप के घमंड में भरे हुए जो धूर्त काम-दोष से कुमारी कन्याओं और विधवाओं के साथ बलात्कार करते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्यु के पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब मनुष्ययोनि में आने के बाद वैसे ही रोगी होते हैं। प्रिये! वे प्रमेहसम्बन्धी भयंकर रोगों से पीड़ित रहते हैं।

 

अन्धत्व और पंगुत्व आदि दोषों का वर्णन

उमा ने पूछा- भगवन! कुछ मनुष्य सूखारोग (जिसमें शरीर सूख जाता है) से पीड़ित एवं दुर्बल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य मांस पर लुभाये रहते हैं, अत्यन्त लोलुप हैं, अपने लिये स्वादिष्ट भोजन चाहते हैं, दूसरों की भोगसामग्री देखकर जलते हैं तथा जो दूसरों के भोगों में दोषदृष्टि रखते हैं, शोभने! ऐसे आचार वाले मनुष्य पुनर्जन्म लेने पर सूखा रोग से पीड़ित हो इतने दुर्बल हो जाते हैं कि उने शरीर में फैली हुई नस-नाड़ियाँ तक दिखायी देती हैं। देवि! वे पापकर्मों का फल भोगने वाले मनुष्य वैसे ही होते हैं।

 

उमा ने पूछा- भगवन! कुछ मनुष्य कोढ़ी होकर कष्ट पाते हैं, यह किस कर्मविपाक का फल है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले मोहवश आघात, वध, बन्धन तथा व्यर्थ दण्ड के द्वारा दूसरों के रूप का नाश करते हैं, किसी की प्रिय वस्तु नष्ट कर देते हैं। चिकित्सक होकर दूसरों को अपथ्य भोजन देते हैं, द्वेष और लोभ के वशीभूत होकर दुष्टता करते हैं, प्राणियों की हिंसा के लिये निर्दय बन जाते हैं, मल देते और दूसरों की चेतना का नाश करते हैं, शोभने! ऐसे आचरण वाले पुरुष पुनर्जन्म के समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो मनुष्यों में सदा दुःखी ही रहते हैं। उस जन्म में वे सैकड़ों कुष्ठ रोगों से घिरकर क्लेश से पीड़ित होते हैं। कोई चर्मदोष से युक्त होते हैं, कोई व्रणकुष्ठ (कोढ़ के घाव) से पीड़ित होते हैं अथवा कोई सफेद कोढ़ से लांछित दिखायी देते हैं। देवि! जिसने जैसा किया है उसके अनुसार फल पाकर वे सब मनुष्य नाना प्रकार के कुष्ठ रोगों के शिकार हो जाते हैं।

 

उमा ने पूछा- भगवन! किस कर्म के विपाक से कुछ मनुष्य अंगहीन एवं पंगु हो जाते हैं, यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोह से आच्छादित होकर प्राणियों के प्राणों की हिंसा करने के लिये उनके अंग-भंग कर देते हैं, शस्त्रों से काटकर उन प्राणियों को निश्चेष्ट बना देते हैं, शोभने! ऐसे आचार वाले पुरुष मरने के बाद पुनर्जन्म लेने पर अंगहीन होते हैं, इसमें संशय नहीं है। वे स्वभावतः पंगु रुप में उत्पन्न होते हैं अथवा जन्म लेने के बाद पंगु हो जाते हैं।

 

उमा ने पूछा- भगवन! कुछ मनुष्य ग्रन्थि (गठिया), पिल्लक (फीलपाँव) आदि रोगों से कष्ट पाते देखे जाते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये।

 

श्री महेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले लोगों की ग्रन्थियों का भेदन करने वाले रहे हैं, जो मुष्टि-प्रहार करने में निर्दय, नृशंस, पापाचारी, तोड़-फोड़ करने वाले और शूल चुभाकर पीड़ा देने वाले रहे हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग फिर जन्म लेने पर गठिया और फीलपाँव से कष्ट पाते तथा अत्यन्त दुःखी होते हैं।[2]

 

उमा ने पूछा- भगवन् देव! कुछ मनुष्य सदा पैरों के रोगों से पीड़ित दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर देवता के स्थान को अपने पैरों से भ्रष्ट करते, घुटनों और एड़ियों से मारकर प्राणियों की हिंसा करते हैं, शोभने! ऐसे आचरण वाले लोग पुनर्जन्म लेने पर श्वपद आदि नाना प्रकार के पाद रोगों से पीड़ित होते हैं।

 

उमा ने पूछा- भगवन्! देव! इस भूतल पर कुछ ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या दिखायी देती है, जो वात, पित्त और कफ जनित रोगों से तथा एक ही साथ इन तीनों के संनिपात से तथा दूसरे-दूसरे अनेक रोगों से कष्ट पाते हुए बहुत दुःखी रहते हैं। वे धनी हों या दरिद्र, पूर्वोक्त रोगों में से कुछ के द्वारा अथवा समस्त रोगों के द्वारा कष्ट पाते रहते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- कल्याणि! इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्म में असुरभाव का आश्रय ले स्वच्छन्दचारी, क्रोधी और गुरुद्रोही हो जाते हैं, मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा दूसरों को दुःख देते हैं, काटते, विदीर्ण करते और पीड़ा देते हुए सदा ही प्राणियों के प्रति निर्दयता दिखाते हैं। शोभने! ऐसे आचरण वाले लोग पुनर्जन्म के समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो वे वैसे ही होते हैं। प्रिये! उस शरीर में वे बहुतेरे भयंकर रोगों से संतप्त होते हैं। किसी को उलटी होती है तो कोई खाँसी से कष्ट पाते हैं। दूसरे बहुत से मनुष्य ज्वर, अतिसार और तृष्णा से पीड़ित रहते हैं। किन्हीं को अनेक प्रकार के पादगुल्म सताते हैं। कुछ लोग कफदोष से पीड़ित होते हैं। कितने ही नाना प्रकार के पादरोग, व्रणकुष्ठ और भगन्दर रोगों से रूग्ण रहते हैं। वे धनी हों या दरिद्र सब लोग रोगों से पीड़ित दिखायी देते हैं। इस प्रकार उन-उन शरीरों में वे अपने किये हुए कर्म का ही फल भोगते हैं। कोई भी बिना किये हुए कर्म के फल को नहीं पा सकता। देवि! इस प्रकार यह विषय मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहती हो?

 

उमा ने पूछा- भगवन्! देवदेवेश्वर! भूतनाथ! आपको नमस्कार है। देव! दूसरे मनुष्य छोटे शरीर वाले, टेढ़े-मेढ़े अंगों वाले, कुबड़े, बौने और लूले दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोह से युक्त हो खरीद-बिक्री के लिये अनाज तौलने के बाटों को तोड़-फोड़कर छोटे कर देते हैं, तराजू में भी कुछ दोष रख लेते हैं और प्रतिदिन क्रय-विक्रय के समय जब उन बाटों को रखकर अनाज तौलते हैं, तब सभी के माल में से आधे की चोरी कर लेते हैं। जो क्रोध करते, दूसरों के शरीर पर चोट करके उसके अंगों में दोष उत्पन्न कर देते हैं, जो मूर्ख मांस खाते और सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरण वाले मनुष्य पुनर्जन्म लेने पर छोटे शरीर वाले बौने और कुबड़े होते हैं।

 

रोगों के कारणभूत दुष्कर्मों का वर्णन

उमा ने पूछा- भगवन! मनुष्यों में से कुछ लोग उन्मत्त और पिशाचों के समान इधर-उधर घूमते दिखायी देते हैं। उनकी ऐसी अवस्था में कौन सा कर्म-फल कारण है? यह मुझे बताइये।[3]

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले दर्प और अहंकार से युक्त हो नाना प्रकार की अंट शंट बातें करते हैं, दूसरों की खूब हँसी उड़ाते हैं, लोभवश, उन्मत्त बना देने वाले भोगों द्वारा दूसरों को मोहित करते हैं, जो मूर्ख वृद्धों और गुरुजनों का व्यर्थ ही उपहास करते हैं तथा शास्त्रज्ञान में चतुर एवं प्रवीण होने पर भी सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरण वाले मनुष्य पुनर्जन्म लेने पर उन्मत्तों और पिशाचों के समान भटकते फिरते हैं, इसमें संशय नहीं है।

 

उमा ने पूछा- भगवन! कुछ मनुष्य संतानहीन होने के कारण अत्यन्त दुःखी रहते हैं। वे जहाँ-तहाँ से प्रयत्न करने पर भी संतानलाभ से वंचित ही रह जाते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताने की कृपा करे।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले समस्त प्राणियों के प्रति निर्दयता का बर्ताव करते हैं, मृगों और पक्षियों के भी बच्चों को मारकर खा जाते हैं, गुरु से द्वेष रखते, दूसरों के पुत्रों के दोष देखते हैं, पार्वण आदि श्राद्धों के द्वारा शास्त्रोक्त रीति से पितरों की पूजा नहीं करते, शोभने! ऐसे आचरण वाले जीव फिर जन्म लेने पर दीर्घकाल के पश्चात् मानवयोनि को पाकर संतानहीन तथा पुत्रशोक से संतप्त होते हैं, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

 

उमा ने कहा- भगवन! मनुष्यों में कुछ लोग अत्यन्त दुःखी दिखायी देते हैं। उने निवास स्थान में उद्वेग का वातावरण छाया रहता है। वे उद्विग्न रहकर संयमपूर्वक व्रत का पालन करते हैं। नित्य शोकमग्न तथा दुर्गतिग्रस्त रहते हैं। किस कर्मविपाक से ऐसा होता है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले प्रतिदिन घूस लेते हैं, दूसरों को डराते और उनके मन में विकार उत्पन्न कर देते हैं, अपने इच्छानुसार दरिद्रों का ऋण बढ़ाते हैं, जो कुत्तों से खेलते और वन में मृगों को त्रास पहुँचाते हैं, जहाँ-तहाँ प्राणियों की हिंसा करते हैं, जिनके घरों में पले कुत्ते व्यर्थ ही लोगों को डराते रहते हैं, प्रिये! ऐसे आचरण वाले मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होकर यमदण्ड से पीड़ित हो चिरकाल तक नरक में पड़े रहते हैं। फिर किसी प्रकार मनुष्य का जन्म पाकर अधिक दुःख से भरे हुए सैकड़ों बाधाओं से व्याप्त कुत्सिक देश में उत्पन्न हो वहाँ दुःखी, शोकमग्न और सब ओर से उद्विग्न बने रहते हैं।

 

उमा ने पूछा- भगवन! भगदेवता के नेत्र को नष्ट करने वाले महादेव! मनुष्यों में कुछ लोग कायर, नपुंसक और हिजड़े देखे जाते हैं, जो इस भूतल पर स्वयं तो नीच हैं ही, नीच कर्मों में तत्पर रहते और नीचों का ही साथ करते हैं। उनके नपुंसक होने में कौन सा कर्मविपाक कारण होता है? यह मुझे बताइये।

 

श्रीमहेश्वर ने कहा- कल्याणि! मैं वह कारण तुम्हें बताता हूँ, सुनो! जो मनुष्य पहले भयंकर कर्म में तत्पर होकर पशु के पुरुषत्व का नाश करने अर्थात पशुओं को बधिया करने के कार्य द्वारा जीवननिर्वाह करते और उसी में सुख मानते हैं, प्रिये! ऐसे आचरण वाले मनुष्य मृत्यु को पाकर यमदण्ड से दण्डित हो चिरकाल तक नरक में निवास करते हैं। यदि मनुष्य जन्म धारण करते हैं तो वैसे ही कायर, नपुंसक और हिजडे़ होते हैं। देवि! जैसे पुरुषों को कर्मजनित फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार स्त्रियों को भी अपने-अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है।

 

पं बनवारी चतुर्वेदी

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