स्वामी लीलाशाह वाणी : परमात्मा मंगल स्वरूप है, जपने वालों का मंगल होता है!

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पराधीन रहने वाले को सर्वदा दुःख प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि वह अपने मन को सदैव वश में रखे, जिसकी इन्द्रियां विषयों से हर प्रकार से निवृत्त होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर, शांत और गंभीर रहती है और उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। इन्द्रियों को छूट देने से अपनी शक्ति क्षीण होती है और इस निर्बलता के कारण मनुष्य को दुःख भोगना पड़ता है किन्तु जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को स्वच्छंद न छोड़कर अपने वश में रखता है, उसकी शक्ति उसके ही भीतर रहती है।

परमात्मा मंगल स्वरूप है, जपने वालों का मंगल होता है। भगवान के दया आदि गुण उसके ह्रदय में आकर वास करते हैं।

जय रामजी की।

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