महर्षि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे कृष्णद्वैपायन

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रामदास चतुर्वेदी। मथुरा 28 जुलाई 2026

अठारह पुराणों, श्रीमद्भागवत, महाभारत, ब्रह्मसूत्र आदि संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों के रचयिता वेदव्यास जी का संस्कृत भारती ब्रजप्रांत मथुरा द्वारा व्यासपूर्णिमा की पूर्व संध्या पर वेदव्यास जी की साधना स्थली कृष्णगंगा घाट पर वैदिक विधि विधान के साथ प्राकट्योत्सव मनाया गया।

ओमप्रकाश बंसल, डॉ धर्मेन्द्र कुमार अग्रतवाल, गणेश शंकर पाण्डेय, आचार्य ब्रजेन्द्र नागर, सुभाष सैनी,योगेश उपाध्याय आवा, रामदास चतुर्वेदी ने वेदव्यास जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
उसके पश्चात संस्कृत भारती ब्रजप्रांत न्यास अध्यक्ष ओमप्रकाश बंसल की अध्यक्षता में विद्वत गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें उन्होंने कहा वेदव्यास नाम नहीं है यह एक उपाधि है प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास रुप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने भी वेदों का चार भागों में विभाजन किया है।

गोष्ठी के मुख्य वक्ता संस्कृत भारती ब्रजप्रांत मंत्री डॉ धर्मेन्द्र कुमार अग्रवाल ने संस्कृत भारती के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महापुरुषों की जयंती मनाने के पीछे युवा पीढ़ी को अपनी धर्म संस्कृति और परम्पराओं का ज्ञान व महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा प्राप्त हो सके यही उद्देश्य है।
गोष्ठी में संस्कृत भारती मथुरा जनपद अध्यक्ष आचार्य ब्रजेन्द्र नागर ने कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जन्म पिता महर्षि पाराशर और माता सत्यवती के यहां हुआ कहा जाता है कि द्वापर युग में एक द्वीप पर जन्म हुआ था और श्याम वर्ण होने के कारण माता पिता ने उनका नाम कृष्णद्वैपायन रख दिया।

कार्यक्रम संयोजक योगेश उपाध्याय आवा ने कृष्णगंगा घाट के पौराणिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा वेदव्यास जी ने मथुरा प्रवास के समय यमुना जी के पावन तट पर कृष्णगंगा घाट पर साघन की थी।

गोष्ठी का शुभारंभ आचार्य मुरलीधर चतुर्वेदी एवं भागवताचार्य सत्यप्रकाश पाण्डेय द्वारा वैदिक व पौराणिक मंगलाचरण से किया गया।हरस्वरुप यादव ने संस्कृत ध्येय मंत्र का पाठ किया।
कार्यक्रम के अन्त में संस्कृत भारती मथुरा के प्रचार प्रमुख रामदास चतुर्वेदी शास्त्री ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी ने महाभारत ग्रंथ का लेखन महर्षि वेदव्यास जी से सुनकर किया था वे संस्कृत भाषा के श्रेष्ठ विद्वान माने जाते हैं।
इस अवसर पर अनिल मित्तल, सुभाष सैनी,रमेश चंद्र शर्मा,डा जमुना शर्मा, संदीप चौधरी, राजेश उपाध्याय, उपेन्द्र शर्मा, सुरेन्द्र पंडित, किशोर सहारिया, मनोज शर्मा, बिट्ठल माधव आदि ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए वेदव्यास जी को त्रिकालदर्शी बताया।

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